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यूपीपीएससी सिलेबस २०२२ । UPPSC SYLLABUS IN HINDI

UPPSC SYLLABUS AND EXAM PATTERN IN HINDI सम्मिलित राज्य/प्रवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा तथा सहायक वन संरक्षक/ क्षेत्रीय वन अधिकारी सेवा परीक्षा दोनों से सम्बन्धित प्रारम्भिक परीक्षा हेतु पाठ्यक्रम- दोस्तों मैं आपकी जानकारी के लिए बताना चाहता हूं कि UPPSC का चयन प्रक्रिया मुख्यतः 3 चरणों में पूरा होता है जिसके बारे में नीचे विस्तार से वर्णन किया गया है।  1. प्रारंभिक ( Prelims ) 2. मुख्य ( Mains ) 3. साक्षात्कार ( Interview )  @ UPPSC Prelims Exam Pattern- (i) UPPSC की परीक्षा offline मोड में होता है।  (ii) UPPSC की परीक्षा OMR बेस होता है। (iii) UPPSC की परीक्षा में पूरे 150 प्रश्न पूछे जाते हैं। (iv) UPPSC के सारे प्रश्न बहुविकल्पी (MCQ) प्रकार के होते हैं।  (v) UPPSC Pre की परीक्षा में 2 Paper होते हैं और दोनों पेपर एक ही दिन में होते हैं। * प्रथम पेपर 150 प्रश्न का होता है। ( General Studies I ) * द्वितीय पेपर 100 प्रश्न का होता है। ( General Studies II )। इसको C-SAT भी कहा जाता है।   (vi) परीक्षा में 0.33 का नेगेटिव मार्किंग होता है। @ UPPSC Mains Exam Pattern- (i) यह परीक्षा ऑफलाइन हो

पर्यावरण किसे कहते हैं?(what is environment in hindi)

पर्यावरण किसे कहते हैं?(what is environment) 

पर्यावरण फ्रेंच शब्द 'Environ' से उत्पन्न हुआ है और environ का शाब्दिक अर्थ है घिरा हुआ अथवा आवृत्त। यह जैविक और अजैविक अवयव का ऐसा समिश्रण है, जो किसी भी जीव को अनेक रूपों से प्रभावित कर सकता है। अब प्रश्न यह उठता है कि कौन किसे आवृत किए हुए है। इसका उत्तर है समस्त जीवधारियों को अजैविक या भौतिक पदार्थ घेरे हुए हैं। अर्थात हम जीवधारियों के चारों ओर जो आवरण है उसे पर्यावरण कहते हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार- पर्यावरण किसी जीव के चारों तरफ घिरे भौतिक एवं जैविक दशाएं एवं उनके साथ अंतःक्रिया को सम्मिलित करता है।

सामान्य रूप में पर्यावरण की प्रकृति से समता की जाती है, जिसके अंतर्गत ग्रहीय पृथ्वी के भौतिक घटकों (स्थल, वायु, जल, मृदा आदि) को सम्मिलित किया जाता है, जो जीवमंडल में विभिन्न जीवों को आधार प्रस्तुत करते हैं, उन्हें आश्रय देते हैं, उनके विकास तथा संवर्धन हेतु आवश्यक दशाएं प्रस्तुत करते हैं एवं उन्हें प्रभावित भी करते हैं। वास्तव में विभिन्न समूहों द्वारा पर्यावरण का अर्थ विभिन्न दृष्टिकोण से विभिन्न रूपों में किया जाता है परंतु सामान्य रूप से यह व्यक्त किया जा सकता है कि पर्यावरण एक अविभाज्य समष्टि है तथा भौतिक, जैविक एवं सांस्कृतिक तत्वों वाले पारस्परिक क्रियाशील तंत्रों से इसकी रचना होती है। यह तंत्र अलग-अलग तथा सामूहिक रूप से विभिन्न रूपों में परस्पर संबद्ध (Interlinked) होते हैं। भौतिक तत्व (स्थान, स्थलरूप, जलीय भाग, जल, वायु, मृदा, शैल तथा खनिज) मानव निवास्य (Human Habitat) क्षेत्र की परिवर्तनशील विशेषताओं, उसके शुभ अवसरों तथा प्रतिबंधक अवस्थितियों (Limitations) को निश्चित करते हैं। जैविक तत्व (पौधे, जंतु, सूक्ष्म-जीव तथा मानव) जीवमंडल की रचना करते हैं। सांस्कृतिक तत्व (आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक) मुख्य रूप से मानव-निर्मित होते हैं तथा सांस्कृतिक पर्यावरण की रचना करते हैं।

पर्यावरण के कार्य और कार्य करने की जो भी विधियां है, वो प्रकृति प्रदत्त साधनों से होती है। पर्यावरण के सभी तत्व एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। पर्यावरण धरती का जीवन आधार है। यह पृथ्वी पर विद्यमान मनुष्यों और जीव-जन्तुओं और वस्पतियों के उद्गम, उद्भव, उसके विकास और अस्तित्व का मुख्य आधार है। यह सब पर्यावरण पर ही निर्भर करते हैं।

जब से सभ्यता का विकास हुआ है, मानव जाति की जितनी भी उन्नति हुई है, वह सब पर्यावरण के कारण ही संभव हो पाया है। पर्यावरण ने इन विकासों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। पर्यावरण का तात्पर्य वनस्पतियों एव जीवधारियो के चारों ओर एक आवरण है, इस आवरण को ही पर्यावरण का नाम दिया गया है।

इन्ही पर्यावरण में कुछ ऐसे कारक भी है, जो संसाधन बनकर उनके रूप में कार्यो को संपन्न करते है और इन्ही में से कुछ नियंत्रक के कार्य करने लग जाते है। कुछ वैज्ञानिक पर्यावरण को Milieu कहते है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है, चारों ओर विद्यमान वातावरण का समूह।

पर्यावरण अलग-अलग विषयों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। जैसे- इकोस्फियर (Ecosphere) अथवा प्राकृतिक वास (Habitat), जीवमंडल (Biosphere) इत्यादि। सामान्य शब्दो में पर्यावरण का यह कार्य है कि वह ऐसी परिस्थितियों और भौतिक दशाओं का प्रदर्शन करता है, जो जीवों अथवा जीवों के समूह के चारों तरफ को ढकती है और उनका प्रभाव भी जीव समूहों पर पड़ता है।

पर्यावरण की विशेषताएं (Characteristics of Environment)-

पर्यावरण की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-

1. जैविक (Biotic) तथा अजैविक (Abiotic) तत्व जब जुड़ते हैं तो यही योग पर्यावरण (Environment) कहलाता है।

2. पर्यावरण के मुख्य तत्वों में जैव विविधता और ऊर्जा आते है। स्थान और समय का परिवर्तन पर्यावरण में होता रहता है।

3. जैविक और अजैविक पदार्थों के कार्यकारी संबंधों पर ही पर्यावरण का आधार स्थित होता है। जबकि इसकी कार्यात्मक की निर्भरता ऊर्जा के संचार पर होती है। 

4. पर्यावरण के अंदर ही जैविक पदार्थ उत्पन्न होते हैं, जिनका कार्य अलग स्थानों पर अलग-अलग ही होता है। मुख्यत: पर्यावरण सामान्य परिस्थिति को संतुलित करने की ओर ही अग्रसर होता है।

5. इसे एक बंद तंत्र भी कह सकते हैं। इन सभी के अंतर्गत प्रकृति का पर्यावरण तंत्र नियंत्रित होता है। तब इस नियंत्रक क्रियाविधि को होमियोस्टैटिक क्रिया विधि के नाम से जाना जाता है। इसी से यह नियंत्रण में रहता है।

पर्यावरण के प्रकार (Types of Environment)-

पर्यावरण को जैविक और भौतिक दोनों ही संकल्पना माना जाता है। इस कारण इसके अंतर्गत मानव जनित पर्यावरण को भी रखा जाता है, इसमें केवल प्राकृतिक पर्यावरण ही नहीं जोड़ा जाता है। यह मानव जनित पर्यावरण हैं – सामाजिक व सांस्कृतिक पर्यावरण।

मुख्यत: पर्यावरण के तीन भाग हैं-

1. प्राकृतिक पर्यावरण

2. मानव निर्मित पर्यावरण

3. सामाजिक पर्यावरण

⋆ प्राकृतिक पर्यावरण-

प्राकृतिक पर्यावरण में सभी जैविक और अजैविक तत्व मौजूद है, जो पृथ्वी पर प्रकृति स्वरूप मिलते हैं। यही आधार है कि प्राकृतिक पर्यावरण दो भागों में बांटा गया है।

प्राकृतिक पर्यावरण के प्रकार-

1. जैविक (Biotic)

2. अजैविक (Abiotic)

जैविक तत्व सूक्ष्म जीव, जंतु और पौधे प्रायोगिक है तथा अजैविक उत्सर्जन, ऊर्जा, जल, वायुमंडल की गैस, वायु, अग्नि और मृदा तथा गुरुत्वाकर्षण इसके अंतर्गत आते हैं।

⋆ मानव निर्मित पर्यावरण-

मानव द्वारा निर्मित पर्यावरण अर्थात ऐसा पर्यावरण जो मानव ने स्वयं निर्मित किए हैं, जिसका रूप कृत्रिम है। उदाहरण के लिए औद्योगिक शहर अंतरिक्ष स्टेशन कृषि के क्षेत्र यह सभी मानव द्वारा निर्मित कृत्रिम पर्यावरण है। जनसंख्या का बढ़ना और आर्थिक विकास के प्रभाव के कारण मानव निर्मित पर्यावरण का क्षेत्र लगातार अपने स्थान में वृद्धि कर रहा है, यह लगातार बढ़ता जा रहा है।

⋆ सामाजिक पर्यावरण-

सामाजिक पर्यावरण (Social Environment) के अंतर्गत सांस्कृतिक मूल्य और मान्यताओं का अपना सम्मिलन है। यहां इस धरती पर भाषा, धर्म, रीति-रिवाजों और मानव की जीवन शैली इन सभी के आधार पर ही सांस्कृतिक पर्यावरण के गठन व निर्माण की रचना होती है।

@ पर्यावरण की संरचना-

पृथ्वी पर प्राप्त होने वाले पर्यावरण (Environment) की मूल संरचना का गठन निम्नलिखित चार भागों से हुआ है-

(i) स्थलमंडल (Lithosphere)

(ii) जलमंडल (Hydrosphere)

(iii) वायुमंडल (Atmosphere)

(iv) जैवमंडल (Biosphere)

⋆ स्थलमंडल (Lithosphere)-

ऐसा माना जाता है कि स्थलमंडल का जो भाग है, वह पूरी पृथ्वी का लगभग 29% भाग है। स्थलमंडल का अधिकतर भाग जीव-जंतु, पेड़-पौधों से भरा हुआ है, इनमें मृदा, पठार, खनिज, चट्टान पहाड़ इत्यादि की भी मौजूदगी है।

स्थलमंडल की उपस्थिति जीवों की सहायता दो तरह से करती है। पहला इन्हें रहने का स्थान दिला कर और दूसरा स्थलीय अथवा जलीय जीवों के लिए खनिज का स्रोत स्थलमंडल स्वयं ही है। स्थलमंडल भी दो भागों में बंटे है- (i) शैल      (ii) मृदा।

इसका शैल वाला भाग कठोर होता है तथा संगठित रहता है और मृदा तब बनती है, जब शैल का उनके स्थान से अपक्षय हो जाता है। मृदा मूल शैलो, जलवायु, सजीव और स्थलाकृतियों के बीच के परस्पर क्रिया करने से निर्मित होता है।

⋆ जलमंडल (Hydrosphere)-

जलमंडल इस पर्यावरण का अति महत्वपूर्ण घटक माना जाता है, क्योंकि इसका कार्य पृथ्वी पर स्थल जीवन और जलीय जीवन को संभावित करना है। जल ही वह मुख्य कारण है, जिससे स्थल पर जीवन संभव है। इसके अंतर्गत धरातल के जल व भूमिगत जल को शामिल किया गया है।

अनेक रूपों में पृथ्वी पर जल की उपस्थिति पाई जाती है, इसके उदाहरण निम्न हैं-

1. महासागर (ocean)

2. हिमनद (glacier)

3. नदियां (rivers)

4. बांध (dam)

स्थल के नीचे का भूगर्भिक जल-

जल को जीव-जंतु अपने भिन्न-भिन्न उपापचय की क्रियाओं के लिए इसे उपयोग में लाते हैं। इसके अलावा जल जीवद्रव्य का सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटक है।

जलमंडल पर अधिकतर जल लवण के रूप में ही है और यह लवणीय जल सागर और महासागर में अधिक पाए जाते हैं। किंतु यह मनुष्य के लिए प्रत्यक्ष रूप से प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है। अलवणीय जल अर्थात स्वच्छ जल का संग्रह मुख्य रूप से नदियों और हिम नदियों तथा भूमिगत जल में होता है। पृथ्वी पर उपयोग में लाए जाने वाले जल, कुल जल का मात्र 1% अथवा उससे भी कम मात्रा में उपलब्ध है।

⋆ वायुमंडल (Atmosphere)-

वायुमंडल मानव जीवन के अति महत्वपूर्ण घटकों में से एक है, इसके बिना जीवन अकाल्पनिक है। वायुमंडल विभिन्न गैसों का सम्मिश्रण होता है। इसमें नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तत्व मौजूद होते हैं।

वायुमंडल में पाई जाने वाली विभिन्न गैसों का सम्मिश्रण:

1. नाइट्रोजन 78.8%  

2. ऑक्सीजन 20.25%  

3. ऑर्गन 0.93%  

4. कार्बन डाइऑक्साइड 0.036%  

5. नियॉन 0.002%  

6. हीलियम 0.0005%  

7. क्रिप्टान 0.001%  

8. जेनान 0.00009% 

9. हाइड्रोजन 0.00005%

पर्यावरण के संघटक (Components of Environment)-

पर्यावरण अनेक तत्वों के सम्मिश्रण से बना हुआ है, इसमें जितने भी तत्व पाए जाते हैं। सभी का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। प्राकृतिक पर्यावरण में पाए जाने वाले तत्व और पारिस्थितिकी में पाया जाने वाला तत्व दोनों समान है। परिस्थितिकी का सबसे मूल घटक पर्यावरण को ही मानते हैं।

पर्यावरण के तत्व का सामान्य स्तर पर तीन समूहों में वर्गीकरण किया गया है-

(i) जैविक संघटक

(ii) भौतिक या अजैविक संघटक

(iii) ऊर्जा संघटक

⋆ जैविक संघटक- 

पर्यावरण में जैविक संघटक के अंतर्गत 3 प्रमुख उपसंघटक आते हैं:- (a) पादप संघटक (b) मनुष्य सहित जन्तु संघटक तथा (c) सूक्ष्म जीव घटक।

परितंत्र में जैविक घटक तथा अजैविक घटक इनकी पृष्ठभूमि का परस्पर क्रियान्वयन होता हैं। इस क्रियान्वयन से प्राथमिक उत्पादक (स्वपोषी) तथा उपभोक्ता (परपोषी) प्राप्त होते हैं।

* प्राथमिक उत्पादक (primary producer)-

प्राथमिक उत्पादक को स्वपोषी (autotroph) भी कहते हैं। प्राथमिक उत्पादक से उत्पन्न जीव आधारभूत रूप से हरे रंग का पौधा, कुछ विशेष शैवाल और जीवाणु, जो स्वपोषी होते है। अर्थात स्वयं अपना पोषण करते हैं तथा सूर्य के प्रकाश की सहायता से सरल और जैविक पदार्थों की उपयोगिता द्वारा स्वयं का भोजन बनाते हैं, वह प्राथमिक उत्पादन के अंतर्गत आते हैं।

* उपभोक्ता (consumers)-

उपभोक्ता को परपोषी (heterotrophs) कहते हैं। यह उस प्रकार के जीव है, जो अपना भोजन स्वयं नहीं तैयार करते हैं बल्कि अन्य जीवों को अपना आहार बनाते हैं। भोजन के लिए ये दूसरों पर निर्भर रहते हैं। उपभोक्ता के अंतर्गत 3 उपवर्ग शामिल किए जाते हैं।

(i) प्राथमिक उपभोक्ता

(ii) द्वितीयक उपभोक्ता तथा 

(iii) तृतीयक उपभोक्ता या जिसे सर्वाहारी भी कह सकते हैं।

* प्राथमिक उपभोक्ता के अंतर्गत वे जीव आते हैं जो शाकाहारी (herbivores) होते हैं, अर्थात जिनका भोजन घास पत्ते और शाक-सब्जियां होती हैं।

* द्वितीयक उपभोक्ता के अंतर्गत ऐसे जीव आते हैं जो भोजन के रूप में दूसरे जीवो का मांस खाते हैं, उन्हें मांसाहारी (carnivores) कहते हैं।

* तृतीयक उपभोक्ता के अंतर्गत सर्वाहारी (Ominivores) जीव आते हैं, सर्वाहारी का अर्थ होता है सभी प्रकार का भोजन ग्रहण करने वाला। जो मांसाहारी और शाकाहारी दोनों प्रकार के भोजन का सेवन करते हैं।

* वियोजक या अपघटक-

योजक या घटक के अंतर्गत विशेष प्रकार के सूक्ष्मजीव आते हैं। ऐसे सूक्ष्मजीव जो मृत हुए पौधों जैविक पदार्थों और जंतु का वियोजन करते हैं, वियोजन से तात्पर्य सड़ना और गलना से है। यह ऐसी प्रक्रिया है, जिसके दौरान सूक्ष्मजीव अपने भोजन का निर्माण करते हैं और जटिल कार्बनिक पदार्थों को एक दूसरे से अलग कर उन्हें सामान्य रूप दे देते हैं, जिनको स्वपोषी तथा प्राथमिक उत्पादक हरे पौधे उपयोगी बनाते हैं। इनमें अधिकतर जीव कवक और सूक्ष्म बैक्टेरिया के रोप में मृदा के रूप में उपस्थित रहते हैं।

⋆ भौतिक या अजैविक संघटक- 

पर्यावरण के अजैविक संघटक के अंतर्गत स्थल, वायु, जल, प्रकाश, तापमान, वर्षण, आर्द्रता एवं जल, अक्षांश, ऊंचाई तथा उच्चावच आदि आते हैं। जिनका वर्णन इस प्रकार हैं –

प्रकाश-

हरे पौधों को बढ़ने के लिए प्रकाश की अति आवश्यकता होती है, वह सूर्य के प्रकाश द्वारा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करते हैं। सभी प्राणियों की, हरे पौधे द्वारा निर्माण किए गए भोज्य पदार्थों पर ही प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भरता होती है। जीवों के लिए सौर ऊर्जा अर्थात सूर्य से प्राप्त किया जाने वाला प्रकाश ही ऊर्जा के रूप में अंतिम स्रोत होता है।

तापमान-

तापमान पर्यावरण के सबसे महत्वपूर्ण घटकों में से एक है। तापमान जीवों की उत्तरजीविता बृहद रूप से प्रभावित करती है। लेकिन प्राणी अपने वृद्धि के लिए केवल एक निश्चित सीमा तक ही तापमान सह सकते हैं। आवश्यकता से अधिक या कम तापमान जीवों की वृद्धि में रुकावट पैदा कर सकती है।

वर्षण-

कोहरे, हिमपात, ओलावृष्टि इत्यादि का सबसे महत्वपूर्ण और अजैविक कारक वर्षण के नाम से जाना जाता है। अधिकतर जीवों की निर्भरता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी न किसी प्रकार वर्षण पर निर्भर करती है। यह प्रक्रिया अधोभूमि से होती है, वर्षा की मात्राएं भिन्न-भिन्न प्रकार से होती हैं, जिनके निर्भरता इस बात पर निर्भर करती है कि आप अथवा आप का निवास स्थान पृथ्वी पर कहां और किस जगह स्थित है।

आर्द्रता एवं जल-

अनेक प्रकार के पौधे और प्राणी जिनके लिए वायु में नमी होना महत्वपूर्ण है, जिससे कि उनका कार्य सही प्रकार से चल सके। कुछ ऐसे भी प्राणी पाए जाते हैं, जिनकी सक्रियता रात में अधिक होती है जब आर्द्रता की अधिकता होती है। जलीय आवास पर, रसायन एवं गैसे उनकी मात्राओं में होने वाले परिवर्तन का तथा गहराइयों में अंतर आने से वे प्रभावित होते हैं।

अक्षांश-

जैसे-जैसे हम विषुवत रेखा से उत्तर अथवा दक्षिण की ओर आगे बढ़ते जाते हैं वैसे वैसे सूर्य की कोणीय दूरी भी कम होती जाती है, जिससे औसत तापमान में कमी आ जाती है।

ऊंचाई-

अलग-अलग ऊंचाइयों पर वर्षण और तापमान दोनों ही भिन्न-भिन्न पाए जाते हैं। वर्षण ऊंचाई के साथ आमतौर पर बढ़ता जाता है लेकिन ज्यादा ऊंचा जाने पर इसमें कमी हो जाती है।

उच्चावच-

उच्चावच को भू आकार भी कहते हैं। यह पर्यावरण का महत्वपूर्ण तत्व है, पूरी पृथ्वी का धरातल विविधता से भरा हुआ है। इन विविधताओं में महाद्वीप के स्तर से लेकर स्थानीय स्तर भी शामिल है। सामान्य उच्चावच के स्वरूपों के तीन उदाहरण है पठार पर्वत और मैदान।

पर्वत और मैदान में ऊंचाई संरचना विस्तारित की क्षेत्रीय विविधताएं देखने को मिलती हैं। जब अपरदन और अपक्षय क्रियाएं होती हैं तब भू-रूप से अनेक नई स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। जैसे कहीं-कहीं पर मरुस्थली स्थलाकृति है तो कहीं पर चूना प्रदेश की आकृति तो वही एक ओर हिमानीकृत भी है तो एक ओर नदी द्वारा निर्माण किया गया मैदानी डेल्टा से युक्त प्रदेश।

⋆ ऊर्जा संघटक- 

इसके अंतर्गत सौर्यिक  ऊर्जा (Thermal Energy) एवं भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) को सम्मिलित किया जाता है।

पर्यावरण अध्ययन की परिभाषा-

पर्यावरण के अध्ययनों को ही पर्यावरणीय अध्ययन के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो रासायनिक, भौतिक, चिकित्सीय, जीव, जन स्वास्थ्य तथा कृषि विज्ञान आदि की शाखाओं से संयुक्त है।

पर्यावरण के अध्ययन करने के निम्न कारण हो सकते हैं:-

1. जीवन के प्रत्येक स्वरूप में पर्यावरण का अपना स्थान है। पर्यावरण सभी के जीवन में एक महत्व रखता है, वह महत्त्व छोटा या बड़ा दोनों हो सकता है।

2. इसीलिए पृथ्वी पर मानवीय जीवन को अस्तित्व में रखने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि जैव विविधता का संरक्षण किया जाए इस कारण पर्यावरण के अध्ययन की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।

3. प्रकृति की संरचना अति विशिष्ट है। प्रकृति के जो भी कार्य और क्रियाएं हैं, इसके पीछे अवश्य ही कोई निश्चित उद्देश्य होता है। कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप में प्रकृति सदैव मानव के जीवन को प्रभावित करती है। यदि प्रकृति में थोड़ा बदलाव आ जाए तो मनुष्य के जीवन पर बड़े संकट आ सकते हैं। इस कारण पर्यावरणीय संरचना का ध्यान रखना प्रत्येक मानव के लिए अति महत्वपूर्ण है।

4. जनसंख्या और संसाधनों के मध्य अनुकूल संबंध स्थापित हो, इसके लिए पर्यावरणीय अध्ययन आवश्यक है।

5. पर्यावरण का अध्ययन करके ही पर्यावरण के विषय में जागरूकता का प्रचार एवं प्रसार करके सतत विकास और आर्थिक उन्नति की बढ़ोतरी की जा सकती है।

पर्यावरण अध्ययन के विषय क्षेत्र (Scope of Environmental Studies)-

वर्तमान में समय के अनुसार पर्यावरणीय संबंध में निम्न विषयों का विशेषत: अध्यापन किया जा रहा है।

1. पारिस्थितिकी एवं पारिस्थितिकी-तंत्र (Ecology and Eco-system)

2. जीवमंडल के संघटक (Components of Biosphere)

3. पर्यावरण प्रकोप (Environmental Hazards)

4. पर्यावरण अवनयन तथा प्रदूषण (Environmental Degradation and Pollution)

5. पर्यावरण प्रबंधन (Environmental Management)

मानव और पर्यावरण संबंध (Man and Environment Relationship)-

मनुष्य की प्राकृतिक पर्यावरण के साथ दो तरफा भूमिका होती है, अर्थात मनुष्य एक तरफ तो भौतिक पर्यावरण के जैविक संगठन का एक महत्वपूर्ण भाग तथा घटक है, तो दूसरी तरफ वह पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण कारक भी है। इस तरह मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण तंत्र को विभिन्न हैसियत से विभिन्न रूपों में प्रभावित करता है। यथा- 'जीवित या भौतिक मनुष्य के रूप में (अर्थात पर्यावरण के एक घटक के रूप में), 'सामाजिक मानव' के रूप में, 'आर्थिक मानव' के रूप में तथा 'प्रौद्योगिक मानव' के रूप में। 

मनुष्य के सभी प्राकृतिक गुण यथा- जन्म, वृद्धि, स्वास्थ्य, मृत्यु आदि प्राकृतिक पर्यावरण द्वारा उसी तरह प्रभावित तथा नियंत्रित होते हैं जैसे कि पर्यावरण के अन्य जीवों के प्राकृतिक गुण प्रभावित तथा नियंत्रित होते हैं। परंतु चूंकि मानव अन्य प्राणियों की तुलना में शारीरिक एवं मानसिक स्तरों तथा प्रौद्योगिक स्तर पर भी सर्वाधिक विकसित प्राणी है अतः वह प्राकृतिक पर्यावरण को बड़े स्तर पर परिवर्तित करके अपने अनुकूल बनाने में समर्थ भी है। 

प्रारंभ में आदिमानव की भौतिक पर्यावरण की कार्यात्मकता में भूमिका दो तरह की होती थी- दाता तथा पाता (Contributor and Receiver) की। अर्थात मनुष्य भौतिक पर्यावरण से अन्य जीवों के समान संसाधन (फल- फूल, पशु-मांस आदि) प्राप्त करता था (पाता की भूमिका) तथा पर्यावरणीय संसाधनों में अपना योगदान भी करता था (दाता- देने वाले की भूमिका, फलों के बीजों को अनजाने में बिखेर कर)। इस तरह मानव संस्कृति के विकास के प्रथम चरण में मनुष्य भौतिक पर्यावरण का अन्य कारकों के समान एक कारक मात्र था परंतु जैसे-जैसे उसके समाज तथा उसकी संस्कृति के विकास के साथ उसकी बुद्धि, कौशल तथा प्रौद्योगिकी विकसित होती गई पर्यावरण के साथ उसकी भूमिका तथा संबंध में उत्तरोत्तर परिवर्तन होता गया। यथा- पर्यावरणीय कारक - पर्यावरण का रूपांतरणकर्ता (Modifire आफ थे Environment) - पर्यावरण का परिवर्तनकर्ता (Changer of the Environment) - तथा पर्यावरण का विध्वंसकर्ता (Destroyer of the Environment)। 

जो मानव प्रारंभ में प्रकृति का अंग तथा साझीदार था वही आगे चलकर उसका स्वामी बन बैठा। अतः मानव एवं पर्यावरण के मध्य सहभागिता तथा परस्परावलम्बन का संबंध चरमरा गया और मानव प्राकृतिक पर्यावरण का कारक एवं पालक न होकर उसका विध्वंसक हो गया।

प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान समय तक मानव-पर्यावरण के मध्य बदलते संबंधों को निम्न चार चरणों में विभाजित किया जाता है-

1. आखेट एवं भोजन संग्रह काल (Period of Hunting and Food Gathering)

2. पशुपालन एवं पशु चारण काल (Period of Animal Domestication and Pastoralism)

3. पौधे पालन एवं कृषि काल (Period of Plant Domestication and Agriculture)

4. विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं औद्योगिक करण काल (Period of Science, Technology and Industrialization)।

> आखेट एवं भोजन संग्रह काल- 

यह काल मानव संस्कृति तथा सभ्यता के प्रारंभिक काल तथा आदि मानव (Primitive Man) से संबंधित है। इसे प्रागैतिहासिक काल भी कहते हैं। इस काल में मानव प्राकृतिक पर्यावरण का एक अभिन्न भाग तथा घटक था। उसके कार्य पर्यावरण के अन्य प्राणियों के समान ही थे, अर्थात् आदि मानव 'भौतिक मानव' के रूप में था क्योंकि उसकी आधारभूत मांग भोजन तक ही सीमित थी। आदि मानव अपने उदर की पूर्ति अपने आस-पास के पर्यावरण में जंगलों से फल-फूल तथा कंदमूल प्राप्त करके आसानी से कर लेता था। उसे किसी स्थाई आवास की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि वह चलता-फिरता घुमंतू प्राणी था तथा पेड़ों पर या गुफा में अपनी रातें गुजारता था। इस तरह स्पष्ट है कि आदि मानव तथा पर्यावरण के बीच मधुर तथा मित्रवत संबंध था। पर्यावरण आज मानव की समस्त आवश्यकताओं (मात्र भोजन तथा आवास) की पूर्ति कर देता था। इस प्रकार आदि मानव प्राकृतिक पर्यावरण पर पूर्णत: निर्भर था। ज्ञातव्य है कि आदि मानव भी पर्यावरण से अपने लिए संसाधन प्राप्त करता था (फल-फूल तथा कंदमूल) परंतु इससे पर्यावरण पर किसी भी तरह का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता था।

> पशुपालन एवं पशु चारण-

समय के साथ मनुष्य ने पशुओं को पालना भी सीख लिया। पशुपालन ने आदि मानव में सामूहिक जीवन को भी जन्म दिया होगा, क्योंकि अपने को तथा अपने पालतू जानवरों को हिंसक जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए जन समुदाय का एक साथ रहना अनिवार्य हो गया होगा (सामाजिक मनुष्य)। परंतु सामूहिक जीवन के साथ-साथ उनका घुमक्कड़ जीवन बना रहा क्योंकि उन्हें भोजन, जल तथा पशुओं के चारे के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना पड़ता था। अत: इनके तथा इनके पालतू पशुओं के आवास अब भी अस्थाई हुआ करते थे। स्मरणीय है कि समय के साथ पालतू पशु तथा मनुष्य की संख्या में वृद्धि होती गई जिस कारण पर्यावरण के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग भी बढ़ता गया, परंतु इसका प्राकृतिक पर्यावरण पर कोई खास बुरा प्रभाव नहीं हो पाया था, क्योंकि पालतू पशुओं तथा मनुष्य की संख्या अब भी सीमा के अंदर थी। अतः मानव के क्रिया-कलापों  द्वारा पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को प्राकृतिक पर्यावरण तंत्र या प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र अपने अंदर आत्मसात करने में सक्षम थी। सामाजिक मानव ने निम्न रूपों में प्राकृतिक पर्यावरण में परिवर्तन किया- 

1. आहार के लिए जंगली जानवरों का शिकार करके। 

2. आखेट द्वारा कुछ पशुओं की संख्या कम करके।

3. प्राकृतिक आवास को बदल कर कुछ पशुओं की संख्या कम करके तथा कुछ की संख्या बढ़ाकर।

4. अपने तथा अपने पालतू पशुओं के आवास तथा मार्ग के लिए वनों को जलाकर।

5. पशुओं तथा कुछ पौधों को पालतू बनाकर।

6. जंगलों को जलाने से स्थान विशेष के पारिस्थितिकीय पर्यावरण को बदल कर। 

7. एक स्थान से दूसरे स्थान में कुछ जंतुओं का स्थानांतरण करके आदि।

> पौधपालन एवं कृषि काल-

पौधों का भोजन के लिए पालना मनुष्य द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण के जैविक संघटकों पर विजय हासिल करने का महत्वपूर्ण प्रयास माना जाता है। वास्तव में समय के साथ मनुष्य की बुद्धि कौशल में निरंतर विकास होता गया। वह धीरे-धीरे प्रकृति को काबू करने में प्रयत्नशील होता रहा और पशुपालन के पौध पालन उसकी बुद्धि में निरंतर विकास की अगली कड़ी था। वह प्रारंभ में अपने आवास के आस-पास अपने द्वारा खाए गए फलों के बिखरे बीजों से उगते पौधों को देखा होगा। अतः मनुष्यों में पौधों को उगाने तथा उन्हें पोषित करने के प्रति इच्छा जागृत हुई होगी। इस तरह पौधों के पालन के माध्यम से प्राचीन कृषि का विकास हुआ होगा, जिस कारण लोगों में स्थाई जीवन (Sedentary or Settled Life) व्यतीत करने की शुरुआत हुई। 

ज्ञातव्य है कि अब भी अधिकांश लोग घुमक्कड़ जीवन ही व्यतीत करते थे। स्मरणीय है कि खाद्यान्न फसलों की कृषि के साथ सामाजिक वर्गों तथा संगठनों का आविर्भाव हुआ जिस कारण प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं (यथा - नील घाटी या मिश्र घाटी की सभ्यता, सिंधु घाटी की सभ्यता आदि) का अभ्युदय हुआ। अधिकांश लोगों ने नदियों की घाटियों में स्थाई रूप से निवास करना प्रारंभ कर दिया क्योंकि वहां पेय जल तथा उपजाऊ भूमि की पर्याप्त सुलभता थी।

स्पष्ट है कि सामाजिक स्तर पर संगठित मानव समुदाय एवं मानव समाज, मानव सभ्यता तथा कृषि-कार्य के अभ्युदय ने मनुष्य तथा प्राकृतिक पर्यावरण के मध्य अब तक चले आ रहे मित्रवत तथा मधुर संबंधों में पर्याप्त परिवर्तन किया। कृषि-रूपों तथा कृषि-कार्यों में निरंतर सुधार, परिमार्जन तथा प्रकृति के फलस्वरूप मानव जनसंख्या में भी निरंतर वृद्धि होती गई। परिणाम स्वरूप अधिकाधिक वनों को साफ करके कृषि भूमि में परिवर्तित किया जाने लगा। इस तरह में स्थानांतरण कृषि (Jhuming or Shifting Cultivation) द्वारा वनों का सर्वाधिक विनाश होने लगा। कृषि के इस पुरातन प्रणाली (दक्षिण एवं दक्षिण पूर्वी एशिया के कई देशों के पहाड़ी क्षेत्रों तथा भारत के उत्तर-पूर्वी पहाड़ी प्रांतों में आज भी झूम-कृषि की जाती है) के अंतर्गत वनों को जलाकर भूमि को साफ करके कृषि के उपयोग में लाया जाता है। चार-पांच वर्षों (या जब तक भूमि की उर्वरता कायम रहती है) के बाद उस क्षेत्र को छोड़ दिया जाता है तथा अन्यत्र वनों को जलाकर कृषि भूमि प्राप्त की जाती है।

कालांतर में मानव ने नई प्रौद्योगिकी का विकास किया तथा अपने निजी पर्यावरण का निर्माण किया। मानव के इस स्वनिर्मित निजी पर्यावरण को 'सांस्कृतिक पर्यावरण' कहते हैं। इसके अंतर्गत उसने अपने रहने के लिए भवनों, गांवों, नगरों, कस्बों आदि का निर्माण किया; सामाजिक संस्थानों यथा- विद्यालयों का निर्माण एवं विकास किया, पूजा घरों का निर्माण किया, यातायात के लिए सड़कें, पुल, रेल आदि बनाई, सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण किया आदि। ज्ञातव्य है कि सांस्कृतिक पर्यावरण के ये तथा अन्य कई तत्वों का विकास एवं संवर्धन कृषि विकास की विभिन्न चरणों एवं अवस्थाओं में संभव हुआ। इस सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण, विकास एवं संवर्धन प्रौद्योगिकी में विकास के कारण ही संभव हो पाया था। 

इस तरह विकसित प्रौद्योगिकी ने 'भौतिक मानव' एवं 'सामाजिक मानव' को 'आर्थिक मानव' में बदल दिया। स्मरणीय है कि 1750 तक विकसित प्रौद्योगिकी विनाशक एवं संहारक नहीं थी वरन् वह मानव के आर्थिक विकास में इस तरह सहायक थी कि उसका प्राकृतिक पर्यावरण पर अधिक कुप्रभाव नहीं था। मनुष्य पर्यावरण के प्राकृतिक संसाधनों को अपने अनुकूल बनाने में समर्थ हो गया परंतु प्रकृति अब भी सर्वोपरि थी।

>विज्ञान प्रौद्योगिकी तथा औद्योगिकीकरण काल-

विज्ञान एवं अत्यधिक विकसित, परिमार्जित एवं दक्ष प्रौद्योगिकी के प्रादुर्भाव के साथ 19वीं सदी के उत्तरार्ध में औद्योगिक क्रांति (1750 से) का  सवेरा होता है। इसी औद्योगीकरण के साथ मनुष्य तथा पर्यावरण के मध्य शत्रुतापूर्ण संबंध की शुरुआत भी होती है। 'आर्थिक निश्चयवाद' (Economic Determinism) की अतिवादी संकल्पना, पश्चिमी दुनिया के सभी लोगों के भौतिकतावादी दृष्टिकोण तथा आधुनिक 'प्रौद्योगिकीय मानव' (Technological Man) की अति विकसित किंतु जानलेवा प्रौद्योगिकी एवं वैज्ञानिक तकनीक के फलस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का औद्योगिक विकास एवं नगरीकरण के लिए अविवेकपूर्ण एवं लोलुपतापूर्ण धुआंधार विदोहन एवं उपयोग प्रारंभ हो गया। इस कारण अनेकों भयावह तथा जानलेवा पर्यावरणीय समस्याओं का प्रादुर्भाव हुआ। आधुनिक प्रौद्योगिकी मानव के प्राकृतिक पर्यावरण पर प्रभाव विभिन्न प्रकार के हैं तथा अत्यंत जटिल हैं क्योंकि प्राकृतिक पर्यावरण के किसी एक अंग/तत्व/घटक में मनुष्य द्वारा परिवर्तन के कारण जीवमंडलीय पारिस्थितिक तंत्र के जैविक एवं अजैविक (भौतिक) संघटकों में श्रृंखलाबद्ध परिवर्तन होते हैं जिस कारण अनेक पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय समस्याएं पैदा हो जाती हैं।

पर्यावरण पर मानव का प्रभाव-

प्राकृतिक पर्यावरण पर मनुष्य के प्रभावों को दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है-

1. प्रत्यक्ष प्रभाव (Direct Impacts)

2. अप्रत्यक्ष प्रभाव (Indirect Impacts)

> प्रत्यक्ष प्रभाव-

यह सुनियोजित एवं संकल्पित होते हैं, क्योंकि किसी भी क्षेत्र में आर्थिक विकास के लिए भौतिक पर्यावरण को परिवर्तित या रूपांतरित करने के लिए चलाए जाने वाले किसी भी कार्यक्रम से उत्पन्न होने वाले परिणामों (अनुकूल तथा प्रतिकूल) से मनुष्य अवगत रहता है। आर्थिक विकास हेतु भौतिक पर्यावरण में इस तरह के परिवर्तनों में प्रमुख हैं-

(i) भूमि उपयोग में परिवर्तन; यथा- कृषि में विस्तार तथा फसलों के उत्पादन के लिए वनों को काटकर साफ करना तथा घास क्षेत्रों को जलाया जाना, व्यापारिक उद्देश्य से पेड़ों को बृहद स्तर पर काटा जाना, नवीन कृषि तकनीकों, अधिक उपज देने वाली बीजों, समुन्नत सिंचाई की सुविधाओं के परिवेश में शस्य प्रारूपों (Cropping Patterns) में परिवर्तन आदि।

(ii) निर्माण तथा उत्खनन कार्य (Constructions and Excavations); यथा- नदी पर बांधों, जल भंडारों तथा सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण, नदी की जलधारा में विपथगमन (Diversion) अर्थात् धाराओं को विभिन्न दिशाओं में किसी खास उद्देश्य के लिए मोड़ना या घुमा देना तथा नदी की जल धाराओं में हस्तक्षेप तथा हेर-फेर, क्षेत्र विशेष को बाढ़ से बचाने के लिए तटबंधों तथा डाइक का निर्माण, सड़कों तथा पुलों का निर्माण, नगरीकरण में वृद्धि तथा विस्तार, खनिजों का खनन, खनिज तेल का बेधन, भूमिगत जल का निष्कासन आदि।

(iii) मौसम रूपांतर कार्यक्रम (Weather Modification Programmes); यथा- वर्षण को प्रेरित करने के लिए मेघ बीजन, उपल वृष्टि (Hailstorm) को रोकना तथा नियंत्रित करना आदि।

(iv) नाभिकीय कार्यक्रम (Nuclear Programmes)


उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक पर्यावरण में इस तरह के मानव जनित परिवर्तनों के प्रभाव अल्पकाल में ही परिलक्षित हो जाते हैं परंतु यह परिवर्तन भौतिक पर्यावरण को दीर्घ काल तक प्रभावित करते रहते हैं। पर्यावरण पर इस मानव जनित प्रत्यक्ष प्रभाव की दूसरी प्रमुख विशेषता यह है कि ये प्रभाव परिवर्तनीय (Reversible) होते हैं क्योंकि प्राकृतिक पर्यावरण को आर्थिक प्रयोजन से प्रभावित करने के पहले उसकी (प्राकृतिक पर्यावरण की) दिशा तथा परिवर्तनों के बाद उत्पन्न दशाओं के अध्ययन के माध्यम से मनुष्य यह जान सकता है कि अमुक कार्यक्रम द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण पर हुए प्रभाव कितने हानिप्रद है। 

इस जानकारी के बाद मनुष्य यदि वह चाहे तो प्रारंभिक कार्यक्रम में समुचित हेर-फेर तथा परिवर्तन करके उस कार्यक्रम द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कुछ हद तक कम कर सकता है या उन्हें दूर कर सकता है। उदाहरण के लिए, वन विनाश (Deforestation) जो या तो कृषि भूमि में विस्तार के लिए या व्यापारिक उद्देश्य के लिए किया जाता है, के कारण मृदा क्षरण की दर में वृद्धि होती है। इस तरह मृदा क्षरण, अवनालिका अपरदन का रूप धारण कर लेता है। 

अत्यधिक भूक्षरण के फलस्वरूप नदियों में अवसादों की मात्रा तथा भार बढ़ जाता है। नदियों के अवसादों से अतिभारित हो जाने के कारण उनकी तली का भराव हो जाने से नदी में जल धारण की क्षमता घट जाती है, परिणामस्वरूप विकट बाढ़ उत्पन्न होती है। इस प्रकार उत्पन्न बाढ़ के कारण अपार जन-धन की हानि होती है। इस तरह प्राकृतिक पर्यावरण के संघटक (वनस्पति समुदाय) में परिवर्तन (वन विनाश) द्वारा उत्पन्न श्रृंखलाबद्ध प्रभावों (निर्वनीकरण--मृदा क्षरण--अवनालिका अपरदन--नदी के अवसाद भार में वृद्धि-- नदी के पेट का भराव-- नदी की जल धारण क्षमता में ह्रास-- बाढ़ की आवृत्ति तथा परिमाण में वृद्धि-- पर्यावरण में अवनयन तथा जन-धन की हानि) को निर्वनीकृत (Deforsted) क्षेत्रों में वृक्षारोपण द्वारा प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है। 

इसी तरह यदि नए कृषि-विधियों द्वारा दुष्प्रभाव होता है तो कृषि विधियों में पर्यावरण पारिस्थितिकीय दशाओं के अनुकूल पुन: परिवर्तन करके इन दुष्प्रभावों से छुटकारा मिल सकता है।

जहां तक स्थानीय एवं प्रादेशिक स्तर पर जलवायु में तथा मौसम में मानव पर परिवर्तनों का सवाल है, इनके पश्चप्रभावों (After Effects) के विषय में पहले से विचार नहीं किया जाता है। उल्लेखनीय है कि मनुष्य के लिए ऋतुवैज्ञानिक प्रक्रमों (Meterological Processes) को अनुशासित करना तथा उन पर पूर्ण स्वामित्व स्थापित करना संभव नहीं है क्योंकि वायुमंडल में इन प्रक्रमों के नियंत्रण हेतु स्थाई मार्ग तथा व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद मनुष्य अवांछित प्राकृतिक वायुमंडलीय प्रक्रमों तथा तूफानों (यथा- विभिन्न प्रकार के चक्रवात- हरिकेन, टॉरनेडो, टाइफून आदि उपल वृष्टि (Hailstorms), वर्षण, मेघ आदि) को नियंत्रित कर सकता है या उनकी दिशा को बदल सकता है। 

ज्ञातव्य है कि हरिकेन द्वारा कारित क्षति का मापन 'साफिर-सिंपसन मापक' द्वारा किया जाता है।

ऋतु वैज्ञानिक तत्वों तथा प्रक्रमों में मनुष्य द्वारा किए जाने वाले प्रत्यक्ष परिवर्तनों ने मेघबीजन (Cloud Seeding) सर्वप्रमुख है। मेघबीजन का प्रमुख उद्देश्य वर्षण की प्रक्रिया को प्रेरित करके अधिक जल वर्षा प्राप्त करना है। मेघ बीजन की प्रक्रिया के अंतर्गत 'ठोस कार्बन डाइऑक्साइड' तथा 'आयोडीन' के कुछ यौगिकों के प्रयोग द्वारा अतिशीतलित बूंदों का घनीभवन (Crystallisation of Supercooled Drops) करना सम्मिलित होता है।

सिंचाई तथा पेयजल के लिए भूमिगत जल का निष्कासन प्राय: सभी देशों में किया जाता है, परंतु भूमिगत जल के विदोहन का परिणाम इतना भयावह होता है कि वह मनुष्य तथा समाज के लिए विनाशकारी हो जाता है। ज्ञातव्य है कि भूमिगत जल का अधिकाधिक दोहन के कारण सतह के नीचे वृहदाकार कोटर (Cavities) बन जाते हैं तथा बाद में कभी-कभी ऊपरी सतह धंसक जाती है। सागर तटीय स्थित शहरों में पेयजल की प्राप्ति के लिए भूमिगत जल के दोहन के कारण सतह के नीचे निर्मित कोटरों में सागर का खारा जल प्रविष्ट हो जाता है जिस कारण भूमिगत जल दूषित हो जाता है। जैसे- ब्रुकलिन शहर (USA) में भूमिगत जल के निष्कासन से पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव।

भूमिगत जल के निष्कासन के कारण स्थल का धंसाव भी होता है (मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में जहां पर धरातल का निर्माण असंगठित तथा ढीले पदार्थों से हुआ है)। विश्व के कई भागों में भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन के कारण स्थलीय भाग में धंसाव की घटनाएं हुई हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका की सन जोवाकिन घाटी में कई स्थानों खास कर कैलिफोर्निया में 1 से 3 मीटर तक स्थल में धंसाव हुआ है।

निर्माण कार्यों (यथा- बांधों तथा जलभंडारों का निर्माण) द्वारा सतह के नीचे स्थित शैलों के संतुलन में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है जिस कारण भूकंपीय घटनाओं का आविर्भाव हो जाता है। ज्ञातव्य है कि प्रमुख नदियों पर निर्मित बांधों के पीछे बनाए गए बृहद जलभंडारों में एकत्रित अपार जलराशि के भार के कारण उत्पन्न द्रवस्थैतिक दबाव (Hydrostatic Pressure) नीचे स्थित शैलों को अव्यवस्थित कर देता है एवं धरातल के नीचे पूर्व स्थिति भ्रंशों को और अधिक सक्रिय कर देता है। इन कारणों के फलस्वरूप सामान्य से लेकर अधिक परिमाण वाली भूकंपीय घटनाएं प्रारंभ हो जाती हैं।

मनुष्य बाढ़ नियंत्रण के उपायों, जल भंडार की रचना, नदी के जल को उसकी घाटी में ही सीमित करने के लिए तटबंधों तथा बाढ़ - दीवालों के निर्माण, बाढ़ - विपथगमन के तंत्रों सरिता जल मार्ग में ही परिवर्तन आदि द्वारा नदी की प्राकृतिक व्यवस्था तथा उसकी पारिस्थितिकी (Ecology) में कई तरह से परिवर्तन करता है।

> अप्रत्यक्ष प्रभाव-

मनुष्य द्वारा पर्यावरण पर अप्रत्यक्ष प्रभाव न तो पहले से सोचे गए होते हैं और न ही नियोजित (Planned) होते हैं। पर्यावरण पर मानव के कार्य-कलापों से जनित अप्रत्यक्ष प्रभाव आर्थिक विकास की रफ्तार को तेज करने के लिए, खासकर औद्योगिक विकास में विस्तार, मनुष्य द्वारा किए गए प्रयासों तथा कार्यों के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। यद्यपि आर्थिक विकास के लिए किए जाने वाले इस तरह के कार्य-कलाप आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं परंतु उनके द्वारा उत्पन्न होने वाले पश्चप्रभाव निश्चय ही सामाजिक दृष्टि से अवांछनीय हैं। 

आर्थिक क्रिया-कलापों से जनित पर्यावरण पर पढ़ने वाले मनुष्य के अप्रत्यक्ष प्रभाव शीघ्र परिलक्षित नहीं होते हैं। इसका प्रमुख कारण है आर्थिक क्रियाओं तथा उनसे उत्पन्न होने वाले परिणामों में समय-शिथिलता (Time Lag)। अर्थात आर्थिक क्रिया-कलापों द्वारा पारिस्थितिक तंत्र के कुछ संघटकों में सामान्य स्तर के मंद गति वाले परिवर्तन होते हैं तथा यह परिवर्तन पारिस्थितिक तंत्र की संवेदनशीलता (Sensitivity) को पार करने में दीर्घ समय लेते हैं। पुनश्च, यह मंद गति से होने वाले परिवर्तन दीर्घ काल तक संचयित होते रहते हैं तथा जब वे पारिस्थितिक तंत्र की इन परिवर्तनों को आत्मसात करने की क्षमता से अधिक हो जाते हैं तब उनका प्रभाव लोगों के सामने आता है। 

कभी-कभी इस तरह के प्रभाव उत्क्रमणीय नहीं (Non Reversible) होते हैं। अतः उनकी पहचान तथा उनका मूल्यांकन करना दुष्कर हो जाता है। इस तरह के अप्रतक्ष्य संचयी प्रभाव (Cumulative Indirect Effects) पारिस्थितिक तंत्र के एक या अधिक संघटकों या संपूर्ण प्राकृतिक तंत्र के एक या अधिक संघटकों या संपूर्ण प्राकृतिक तंत्र को परिवर्तित कर देते हैं, जो मानव वर्ग के लिए घातक एवं जानलेवा हो जाता है। मनुष्य के द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव में से अधिकांश पर्यावरण अवनयन (Environmental Degradation) तथा प्रदूषण से संबंधित होते हैं। इस तरह के अप्रत्यक्ष प्रभावों के कुछ उदाहरण निम्न प्रकार हैं-

कीटनाशक, रासायनिक दवाओं, रासायनिक उर्वरकों आदि के प्रयोग के माध्यम से जहरीले तत्वों के पारिस्थितिक तंत्र में विमोचन (Release) द्वारा आहार-श्रृंखला (Food Chains) तथा आहार-जाल (Food Webs) में परिवर्तन हो जाता है। इस संदर्भ में D.D.T. सबसे अधिक जहरीला तत्व होता है। इसी तरह औद्योगिक संस्थानों से निकले अपशिष्ट पदार्थों (Industrial Wastes) के स्थिर जल (झील, तालाब, जल भंडार आदि), नदियों के जल एवं सागरीय जल में विमोचन के कारण जल दूषित हो जाता है जिस कारण कई तरह के रोग उत्पन्न हो जाते हैं तथा जल स्थित अनेकों जीवधारियों की मृत्यु हो जाती है। 

इस तरह के जल को दूषित करने वाले कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों में प्रमुख हैं- कारखानों से निकले कचरों की जल में धुलाई तथा उनका जल में ढेर लगाना, एस्बेस्टस की झाई (Specks) का जल में विमोचन तथा संचयन, जहरीले मिथाइल के रूप में पारे का विमोचन, तेल वाहक जलयानों से खनिज तेल का सागरीय जल में रिसाव, सीसे (Lead) की विमोचन, घुले हुए अकार्बनिक तत्वों का विभिन्न मात्रा में मिश्रण आदि।

M.C. Saxena के अनुसार, प्रतिवर्ष मनुष्य द्वारा 2000 रसायनों का पर्यावरण में विमोचन किया जाता है। इनके मतानुसार यह जहरीले तत्व महिलाओं की गर्भ नली से होते हुए उनके गर्भाशय में पनपते हुए भ्रूण तक पहुंच जाते हैं, जिस कारण महिलाओं में गर्भपात तथा समय से पहले प्रसव हो जाता है। नगरीकरण में वृद्धि और औद्योगिक विस्तार के कारण प्रदूषण करने वाले तत्वों का अधिकारिक मात्रा में पारिस्थितिक तंत्र में विमोचन हो रहा है तथा इनकी मात्रा दिनों-दिन तीव्र गति से बढ़ रही है। इस तरह के प्रदूषणकर्ता तत्वों में प्रमुख है- क्लोरीन, सल्फेट, बाईकार्बोनेट, नाइट्रेट, सोडियम, मैग्नीशियम, फॉस्फेट आदि के आयन। इस तरह के प्रदूषणकर्ता तत्व नगरों तथा कारखानों से निकलने वाले कचरा तथा गंदे जल के नालों (Sewage Effluents) के माध्यम से जलाशयों, झीलों तथा नदियों तक पहुंचते हैं तथा उनके जल को दूषित करते हैं। 

विकसित देशों एवं कतिपय विकासशील देशों की प्रमुख नदियां नगरों तथा कारखानों से आने वाले कचरों तथा गंदे जल के कारण प्रदूषित हो गई हैं। घने बसे देशों तथा औद्योगिक रूप से विकसित देशों से होकर बहने वाली नदियां अपने स्वाभाविक प्राकृतिक स्वरूप को खो चुकी हैं तथा परिवहन जल तथा शक्ति के तंत्रों एवं मलवाहक नालों के रूप में परिवर्तित कर दी गई हैं।

 नगरीकरण, औद्योगिक विस्तार तथा भूमि उपयोग में परिवर्तनों के कारण मौसम तथा जलवायु में भी परिवर्तन होते हैं। यद्यपि यह परिवर्तन दीर्घ काल के बाद परिलक्षित होते हैं। मनुष्य की आर्थिक क्रियाएं पृथ्वी तथा वायुमंडल के ऊष्मा संतुलन को प्रभावित करने में समर्थ हैं। इस तरह ऊष्मा संतुलन में परिवर्तन यदि बड़े पैमाने पर होता है तो इसके कारण प्रादेशिक तथा विश्व स्तरों पर मौसम तथा जलवायु में रूपांतर हो जा सकता है। वास्तव में मनुष्य मौसमी दशाओं को निम्न रूप में प्रभावित करता है- 

1. वायुमंडल के निचले स्तर में उसके प्राकृतिक गैसीय संघटन में परिवर्तन द्वारा।

2. क्षोभमंडल (परिवर्तन मंडल) एवं समताप मंडल में प्रत्यक्ष (मेघ बीजन द्वारा- Cloud Seeding) तथा अप्रत्यक्ष (निर्वनीकरण, खनन तथा नगरीकरण आदि द्वारा) साधनों से जलवाष्प की मात्रा में परिवर्तन द्वारा।

3. धरातलीय सतह में परिवर्तन तथा रूपांतर द्वारा (निर्वनीकरण, खनन, नगरीकरण आदि द्वारा)।

4. निचले वायुमंडल में वायु धुंध (Aerosol) के प्रवेश द्वारा।

5. नगरीय, औद्योगिक आदि स्रोतों से वायुमंडल में अतिरिक्त ऊर्जा के विमोचन द्वारा आदि।

हाइड्रोकार्बन ईंधनों के जलाने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के सांद्रण में वृद्धि हुई है। औद्योगिक क्रांति के पहले वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मौलिक मात्रा 0.029 प्रतिशत या 290ppm (part per million) थी। परंतु वर्तमान समय में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के सांद्रण का स्तर 0.0379 प्रतिशत या 379ppm तक हो गया है, जो औद्योगिक क्रांति के पूर्व CO2 के स्तर में 25% की वृद्धि का द्योतक है। 

ज्ञातव्य है कि वायुमंडलीय CO2 में वृद्धि होने से वायुमंडल के ऊष्मा संतुलन में परिवर्तन हो सकता है, क्योंकि CO2 पार्थिव विकिरण का अवशोषण करके वायुमंडल तथा पृथ्वी की सतह को गर्म करती है। मानव कार्यों द्वारा ओजोन गैस में निम्न रूपों में रिक्तता (Depletion) हो रही है- स्प्रेकैन डिस्पेंसर में प्रयुक्त प्रणोदकों, रेफ्रीजरेटरों एवं एयरकंडीशनरों में प्रयुक्त तरल पदार्थों और सुपरसोनिक जेट विमानों से निस्सृत नाइट्रोजन ऑक्साइड्स के कारण ओजोन (O3) का ऑक्सीजन (O2) में विघटन हो जाता है। इस प्रकार ओजोन का रिक्तिकरण होता रहता है। 

ज्ञातव्य है कि ओजोन गैस पृथ्वी पर वनस्पतियों तथा जंतुओं के लिए रक्षा कवच है, क्योंकि यह सूर्य की पराबैंगनी किरणों (Ultraviolet Rays) को सोख लेती है तथा पृथ्वी की सतह को अत्यधिक गर्म होने से बचाती है। इस तरह ओज़ोन की रिक्तता का परिणाम यह होगा कि सूर्य की पराबैंगनी किरणों का वायुमंडल में अवशोषण घटता जाएगा तथा भूतल के तापमान में आवश्यकता से अधिक वृद्धि का परिणाम होगा- चर्म कैंसर में वृद्धि, मानव शरीर में प्रतिरक्षण क्षमता में ह्रास, प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis), जल ग्रहण की क्षमता तथा फसल उत्पादन में ह्रास। 

सागरीय पर्यावरण पर भी ओजोन की रिक्तता के कारण तापमान में वृद्धि का दूरगामी दुष्प्रभाव होगा, क्योंकि प्रकाश संश्लेषण में कमी के कारण फाइटोप्लैंक्टन की उत्पादकता में ह्रास होगा। इस स्थिति के कारण जूप्लैंक्टन में भुखमरी हो जाएगा (क्योंकि जूप्लैंक्टन अपने आहार के लिए फाइटोप्लैंक्टन पर निर्भर होते हैं)। इसके द्वारा जूप्लैंक्टन के कारण लारवा की मर्त्यता (Mortality) भी प्रभावित होती है। सागरीय पारिस्थितिक तंत्र की जातियों के संघटन में भी परिवर्तन हो सकता है, क्योंकि कुछ जातियां पराबैंगनी विकिरण को सहन नहीं कर सकती। पराबैंगनी विकिरण को सहन नहीं कर सकती। पराबैंगनी विकिरण फोटोकेमिकल प्रक्रियाओं को भी तेज कर देता है जिस कारण जहरीला कुहरा बनता है।

मानव व पर्यावरण संबंधी अवधारणा (Human and Environment Related Approach)-

1. नियतिवादी अवधारणा (Determinism Approach)- यह मानव को पर्यावरण का ही एक तत्व मानता है। हम्बोल्ट व कार्ल रिटर जैसे नियतिवादी भूगोलवेत्ताओं ने मानव जीवन को प्रकृति पर पूर्णत: निर्भर माना है। अर्थात प्रकृति को सर्वशक्तिमान एवं नियंत्रक माना गया है तथा मानव को प्रकृति के हाथों का खिलौना कहा गया है। इस अवधारणा को निश्चयवाद की भी संज्ञा प्रदान की गई है।

2. संभववादी अवधारणा (Possibilism Approach)- विडाल-डी-ला-ब्लाश, ब्रूंस व डिमांजिया जैसे संभववादी भूगोलवेत्ता मानव को पर्यावरण का एक सक्रिय तत्व मानते हुए कहते हैं कि मानव प्रकृति पर विजय प्राप्त कर चुका है एवं उसमें हर प्रकार का परिवर्तन कर सकता है। आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि उसके पास जरूरी पूंजी, तकनीकी दक्षता व इच्छाशक्ति कितनी है?

3. नव-नियतिवादी अवधारणा (Neo-determinism Approach)- यह अवधारणा दोनों ही अतिवादी अवधारणाओं का खंडन करती है। ग्रिफिथ टेलर एवं  O.H.K. स्पेट जैसे भूगोलवेत्ताओं ने प्रकृति की एक पक्षीय दोहन की आलोचना की और बताया कि प्रकृति का अत्यधिक दोहन विनाशकारी हो सकता है। उन्होंने प्रकृति के संदर्भ में 'रुको और जाओ' (Stop and Go Determinism) की नीति अपनाने को कहा एवं बताया कि प्रकृति की अपनी सुंदरता है, अपनी सीमाएं हैं। अतः हमें चाहिए कि हम प्रकृति को समझने का प्रयास करें, उसके बाद अपने विकास नीतियों का निर्धारण करें। वस्तुतः टिकाऊ या शाश्वत विकास (Sustainable Development) नव नियतिवादी अवधारणा से ही संबंध रखता है।

4. कृतिवाद (Voluntarism)- इस अवधारणा के अनुसार मानव पर्यावरण को एक सहनीय स्थिति अथवा संभाविता स्थिति तक परिवर्तित कर सकता है।

5. मानकी दृष्टिकोंण (Normative Approach)- इस अवधारणा में मानव एवं पर्यावरण के अंतर-संबंधों को सर्वोत्तम अथवा आदर्श स्थिति के रूप में प्रतिपादित किया गया है।

6. पारिस्थितिकी दृष्टिकोंण (Ecological Approach)- इस अवधारणा में मानव को पारिस्थितिकी तंत्र का एक घटक मानते हुए पर्यावरण के साथ उसके संबंध को पारिस्थितिकीय दृष्टिकोंण के अंतर्गत समाहित किया गया है।






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भारत की स्थिति एवं विस्तार- भारत की विशालता के कारण इसे उपमहाद्वीप की संज्ञा दी गई है। यह एशिया महाद्वीप के दक्षिण में स्थित है। इसका प्राचीन नाम 'आर्यावर्त ' उत्तर भारत में बसने वाले आर्यों के नाम पर किया गया। इन आर्यों के शक्तिशाली राजा भरत के नाम पर यह भारतवर्ष कहलाया। वैदिक आर्यों का निवास स्थान सिंधु घाटी में था, जिसे ईरानियों ने ' हिन्दू नदी' तथा इस देेेश को 'हिन्दुस्तान' कहा। यूनानियों ने सिंधु को 'इंडस' तथा इस देेेश को 'इंडिया' कहा। भारत का भूगोल 1. भारत विषुवत रेखा के उत्तरी गोलार्ध में अवस्थित है। भारतीय मुख्य भूमि दक्षिण में कन्याकुमारी (तमिलनाडु)  (8°4' उत्तरी अक्षांश) से उत्तर में इन्दिरा कॉल (लद्दाख) (37°6' उत्तरी अक्षांश) तक तथा पश्चिम में द्वारका (गुजरात) (68°7' पूर्वी देशांतर) से कीबिथू ( अरुणाचल प्रदेश) (97°25' पूर्वी देशांतर) के मध्य अवस्थित है। 2.   82°30' पूर्वी देशांतर भारत के लगभग मध्य (प्रयागराज के नैनी  सेे) से होकर गुजरती है जो कि देश का मानक समय  है। यह ग्रीनविच समय से 5 घंटे 30 मिनट आग

भारत की भूगर्भिक संरचना, (Geological structure of India)

भारत की भूगर्भिक संरचना, (Geological structure of India) भारत की भूगर्भिक संरचना परिचय (Introduction) - किसी देश की भूगर्भिक संरचना हमें कई बातों की समझ में सहायता करती है, जैसे- चट्टानों के प्रकार, उनके चरित्र तथा ढलान, मृदा की भौतिक एवं रासायनिक विशेषताएं, खनिजों की उपलब्धता तथा पृष्ठीय एवं भूमिगत जल संसाधनों की जानकारी, इत्यादि। भारत का भूगर्भिय इतिहास बहुत जटिल है। भूपटल की उत्पत्ति के साथ ही इसमें भारत की चट्टानों की उत्पत्ति आरंभ होती है। इसकी बहुत सी चट्टानों की रचना अध्यारोपण (superimposition) के फलस्वरूप हुई। भूगर्भिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप गोंडवानालैंड अर्थात् दक्षिणी महाद्वीप का भाग था। अल्पाइन-पर्वतोत्पत्ति (orogeny) के उपरांत तृतीयक काल (tertiary period) में हिमालय पर्वत का उत्थान आरंभ हुआ और प्लिस्टोसीन (pleistocene)  युग में उत्तरी भारत के मैदान की उत्पत्ति आरंभ हुई। भारत की भूगर्भिक रचना का संक्षिप्त वर्णन आगे प्रस्तुत किया गया है। 1.आर्कियन शैल-समूह (Archaean or Pre- Cambrian Formations)- आर्कियन महाकल्प (Archaean Era) को प्री-कैम्ब्रियन (Pre-cambrian) युग भी कहा

भारत का अपवाह तंत्र। (Drainage system of india in hindi)

अपवाह तंत्र किसे कहते हैं? या अपवाह तंत्र क्या है? अपवाह का अभिप्राय जल धाराओं तथा नदियों द्वारा जल के धरातलीय प्रवाह से है। अपवाह तंत्र या प्रवाह प्रणाली किसी नदी तथा उसकी सहायक धाराओं द्वारा निर्मित जल प्रवाह की विशेष व्यवस्था है यह एक तरह का जालतंत्र या नेटवर्क है जिसमें नदियां एक दूसरे से मिलकर जल के एक दिशीय प्रवाह का मार्ग बनाती हैं। किसी नदी में मिलने वाली सारी सहायक नदियां और उस नदी बेसिन के अन्य लक्षण मिलकर उस नदी का अपवाह तंत्र बनाते हैं।  भारत का अपवाह तंत्र एक नदी बेसिन आसपास की नदियों के बेसिन से जल विभाजक के द्वारा सीमांकित किया जाता है। नदी बेसिन को एक बेसिक जियोमॉर्फिक इकाई (Geomorphic Unit) के रूप में भी माना जाता है जिससे किसी क्षेत्र एवं प्रदेश की विकास योजना बनाने में सहायता मिलती है। नदी बेसिन के वैज्ञानिक अध्ययन का महत्व निम्न कारणों से होता है- (i) नदी बेसिन को एक अनुक्रमिक अथवा पदानुक्रम में रखा जा सकता है। (ii) नदी बेसिन एक क्षेत्रीय इकाई (Area Unit) है जिसका मात्रात्मक अध्ययन किया जा सकता है और आंकड़ों के आधार पर प्रभावशाली योजनाएं तैयार की जा सकती हैं। (i