सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Featured Post

यूपीपीएससी सिलेबस २०२२ । UPPSC SYLLABUS IN HINDI

UPPSC SYLLABUS AND EXAM PATTERN IN HINDI सम्मिलित राज्य/प्रवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा तथा सहायक वन संरक्षक/ क्षेत्रीय वन अधिकारी सेवा परीक्षा दोनों से सम्बन्धित प्रारम्भिक परीक्षा हेतु पाठ्यक्रम- दोस्तों मैं आपकी जानकारी के लिए बताना चाहता हूं कि UPPSC का चयन प्रक्रिया मुख्यतः 3 चरणों में पूरा होता है जिसके बारे में नीचे विस्तार से वर्णन किया गया है।  1. प्रारंभिक ( Prelims ) 2. मुख्य ( Mains ) 3. साक्षात्कार ( Interview )  @ UPPSC Prelims Exam Pattern- (i) UPPSC की परीक्षा offline मोड में होता है।  (ii) UPPSC की परीक्षा OMR बेस होता है। (iii) UPPSC की परीक्षा में पूरे 150 प्रश्न पूछे जाते हैं। (iv) UPPSC के सारे प्रश्न बहुविकल्पी (MCQ) प्रकार के होते हैं।  (v) UPPSC Pre की परीक्षा में 2 Paper होते हैं और दोनों पेपर एक ही दिन में होते हैं। * प्रथम पेपर 150 प्रश्न का होता है। ( General Studies I ) * द्वितीय पेपर 100 प्रश्न का होता है। ( General Studies II )। इसको C-SAT भी कहा जाता है।   (vi) परीक्षा में 0.33 का नेगेटिव मार्किंग होता है। @ UPPSC Mains Exam Pattern- (i) यह परीक्षा ऑफलाइन हो

भारत के भौतिक प्रदेश। Physical Region of India in Hindi

भारत के भौतिक प्रदेश। Physical Region of India in Hindi

भू-आकृति विज्ञान पृथ्वी की स्थलाकृतियों और उसके धरातल की विशेषताओं का अध्ययन करता है। भारत के लगभग 10.6% क्षेत्र पर पर्वत, 18.5% क्षेत्र पर पहाड़ियां, 27.7% पर पठार तथा 43.2% क्षेत्रफल पर मैदान विस्तृत हैं। विवर्तनिक इतिहास और स्तरित-शैल-विज्ञान के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप को निम्न पांच भौतिक प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है-

1. उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र

2. दक्षिण का विशाल प्रायद्वीपीय पठार

3. विशाल (सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र) मैदान तथा

4. तटीय मैदान एवं

5. द्वीप समूह

https://www.geographya2z.in/2022/03/physical-region-of-india-in-hindi.html
भारत के भौतिक प्रदेश

1. उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र-

 हिमालय पर्वत श्रेणी-

हिमालय पर्वत श्रेणियों का वर्गीकरण-

1. महान हिमालय (हिमाद्रि)- 
2. मध्य या लघु हिमालय-
3. शिवालिक हिमालय-
(i) ट्रांस या तिब्बत हिमालय-
(ii) पूर्वांचल की पहाड़ियां-

हिमालय का प्रादेशिक विभाजन -

(I) पंजाब हिमालय-                             
(II) कुमायूं हिमालय-
(III) नेपाल हिमालय-
(IV) असम हिमालय-

2. दक्षिण का विशाल प्रायद्वीप पठार-

 प्रायद्वीपीय पर्वत-

i. अरावली पर्वत
ii. विंध्याचल पर्वत
iii. सतपुड़ा पर्वत श्रेणी
iv. पश्चिमी घाट पर्वत (सहयाद्री)-
v. पूर्वी घाट पर्वत

 प्रायद्वीपीय पठार-

(i) दक्कन का पठार-
(a) तेलंगाना का पठार
(b) कर्नाटक का पठार
(ii) मेघालय का पठार
(iii) कच्छ प्रायद्वीप का पठार
(iv) छोटा नागपुर का पठार
(v) मालवा का पठार
(vi) बुंदेलखंड का पठार
(vii) बघेलखंड का पठार
(viii) दंडकारण्य का पठार

3. विशाल मैदान

(i) भाबर प्रदेश
(ii) तराई प्रदेश
(iii) बांगर प्रदेश
(iv) खादर प्रदेश

विशाल मैदान का क्षेत्रीय विभाजन-
(i) पंजाब हरियाणा का मैदान
(ii) राजस्थान का मैदान
(iii) गंगा का मैदान
(iv) ब्रह्मपुत्र का मैदान

4. तटवर्ती मैदान-

(i) पश्चिमी तटीय मैदान
(ii) पूर्वी तटीय मैदान

5. द्वीप समूह-

(i) बंगाल की खाड़ी के द्वीप-
(ii) अरब सागर के द्वीप-


 अपतटीय द्वीप (Offshare Islands)-

यह पर्वतीय भाग महान हिमालय पर्वत श्रृंखला के एक भाग का निर्माण करते हैं जो भारतीय भूखंड के बाहर तक विस्तृत है तथा विश्व के सर्वाधिक युवाओं में से एक है। हिमालय विश्व की नवीनतम मोड़दार वलित पर्वतमाला है। कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक हिमालय पर्वत श्रृंखला 2500 किमी लंबाई में फैली हुई है। पूर्व में इसकी चौड़ाई 150 किमी तथा पश्चिम में 500 किमी है। इसकी औसत ऊंचाई 6000 मीटर है। एशिया महाद्वीप में 6500 मीटर से अधिक ऊंची चोटियां 94 हैं, जिनमें से 92 चोटियां इसी पर्वतीय प्रदेश में स्थित है। यह पर्वतमाला भारत के 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत हैं। इस पर्वतीय प्रदेश में तीन प्रमुख पर्वत श्रृंखलाएं स्थित हैं-

(I) हिमालय पर्वत श्रेणी

(II) ट्रांस या तिब्बत हिमालय एवं

(III) पूर्वांचल की पहाड़ियां

✱ यह विश्व का नवीनतम मोड़दार पर्वत है जो मुख्य रूप से परतदार चट्टानों से निर्मित है इसका निर्माण टर्शियरी काल में हुआ है। यह पर्वत श्रेणी पश्चिम में नंगा पर्वत से लेकर पूर्व में नामचा बरवा तक विस्तृत है। 

✱ कार्बोनिफरस काल से ही प्रायद्वीपीय भारत का स्थानांतरण उत्तर एवं उत्तर पूर्व की ओर निरंतर जारी है। इसके फलस्वरूप भारतीय प्लेट का टकराव यूरेशिया प्लेट से हुआ जो अपेक्षाकृत काफी धीमी गति से दक्षिण की ओर स्थानांतरित होता रहा है। इन दोनों प्लेटों के टकराव से इनके बीच स्थित टेथिस सागर के मलबों पर दबाव पड़ा जिसके फलस्वरूप हिमालय की उत्पत्ति हुई। चूंकि भारतीय प्लेट अभी भी गतिशील है। यही कारण है कि हिमालय का उत्थान वर्तमान समय में भी जारी है। हिमालय एक विवर्तनिक पर्वत है। हिमालय का उत्थान कार्य तीन चरणों में पूरा हुआ, जिसके फलस्वरूप तीन स्पष्ट श्रेणियों का निर्माण हुआ।

✱ जहां आज हिमालय है वहां लगभग 7 करोड़ वर्ष पूर्व टेथिस सागर था। ओलिगोसीन काल में महान हिमालय का निर्माण हुआ तथा हिमालय के समानांतर दक्षिण में दर्द का निर्माण हुआ जो कालांतर में हिमालय की नदियों द्वारा लाए गए मलबों से भर गया। इस प्रकार मायोसीन काल के भू-संचलन से द्वितीय चरण में मध्य हिमालय का निर्माण हुआ। हिमालय का अंतिम उत्थान ऊपरी प्लायोसीन काल में हुआ। तृतीय चरण के उत्थान के फलस्वरूप शिवालिक हिमालय का निर्माण हुआ।

✱ हिमालय पर्वत श्रेणी में रीड की हड्डी के रूप में नाइस एवं अन्य रवेदार चट्टाने मौजूद है। शिष्ट, स्लेट, फाइलाइट, क्वार्टजाइट, चुना पत्थर आदि के रूप में प्राचीन चट्टाने पाई जाती हैं।

यह भी पढ़ें- 1. भारत का अपवाह तंत्रDrainage system of India in hindi

2. भारत में अपवाह प्रतिरूप। Drainage Pattern in India

3. पृथ्वी की आंतरिक संरचना

✱ इसे हिमाद्रि, वृहत एवं आंतरिक हिमालय के नाम से भी जाना जाता है। इसका निर्माण लगभग 7 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ है।

✱ यह हिमालय की सबसे ऊंची पर्वत श्रेणी है। इसकी लंबाई 2500 किमी है। इसकी औसत ऊंचाई लगभग 6000 मीटर है तथा आवश्यक चौड़ाई 25 किमी है। इस श्रेणी की दक्षिणी ढाल उत्तरी ढाल की तुलना में काफी तीव्र है यह पश्चिम में सिंधु नदी के गोर्ज से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के गोर्ज तक फैली हुई है।

✱ विश्व की अधिकांश पर्वत चोटियां इसी पर्वत श्रेणी में अवस्थित हैं- जैसे एवरेस्ट (8848 मी), कंचनजंगा (8598 मी), मकालु (8481 मी), धौलागिरी (8172 मी), नंगा पर्वत (8126 मी), नंदा देवी (7817 मी), नामचा बरवा (7756 मी), त्रिशूल, बद्रीनाथ, नीलकंठ एवं केदारनाथ हैं। एवरेस्ट चोटी को तिब्बती भाषा में चोमोलूंगमा तथा नेपाल में  सागरमाथा कहा जाता है।

✱ महान हिमालय के कुछ महत्वपूर्ण दर्रे निम्नलिखित हैं- बुर्जिल एवं जोजिला (जम्मू कश्मीर), शिपकीला, बारालाचाला (हिमाचल प्रदेश), थागा ला, नीति, लीपूलेख (उत्तराखंड), नाथूला, जेलेपला (सिक्किम), बोमडिला, बुमला, टूंगला और पुंगम (अरुणाचल प्रदेश)।

✱ गंगोत्री, मिलाम, जेमू आदि हिमनद महत्वपूर्ण हैं। यहां हिम नदियां कश्मीर में 2400 मीटर की ऊंचाई तक तथा मध्य एवं पूर्वी भाग में 4000 मीटर की ऊंचाई तक पाई जाती हैं।

✱ सामान्यत: 5000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर हिम रेखा पाई जाती है। पूर्वी भाग की तुलना में पश्चिमी भाग में हिम रेखा की ऊंचाई अधिक पाई जाती है।

✱ महान हिमालय भारत में हिमालय की सर्वोच्च चोटी कंचनजंगा (8598 मीटर) स्थित विश्व की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है जो सिक्किम राज्य में स्थित है। महान हिमालय की चौड़ाई 100 से 150 किलोमीटर के बीच है। कालिमपोंग एवं ल्हासा के बीच का सड़क मार्ग जेलेपला दर्रा से होकर जाता है। 

✱ यह सर्वोच्च हिमालय के दक्षिण में स्थित है। इसे हिमाचल या मध्य हिमालय के नाम से भी जाना जाता है।

✱ इसकी सामान्य ऊंचाई 3700 से 4500 मीटर के मध्य है तथा चौड़ाई 80 से 100 किलोमीटर के बीच है।

✱ लघु हिमालय की कुछ महत्वपूर्ण श्रेणियां- (i) पीर पंजाल श्रेणी (कश्मीर), (ii) धौलाधार श्रेणी (हिमाचल प्रदेश), (iii) नाग टिब्बा श्रेणी, (iv) मसूरी श्रेणी (कुमायूं में), (v) महाभारत श्रेणी (नेपाल)।

✱ भारत के अधिकांश पर्यटक स्थल जैसे शिमला धौलाधार श्रेणी पर स्थित है। रानीखेत, नैनीताल, मसूरी, अल्मोड़ा, दार्जिलिंग, चकराता आदि लघु हिमालय पर ही स्थित है।

✱ पीर पंजाल एवं बनिहाल पीर पंजाल श्रेणी पर स्थित दो दर्रे हैं। बनिहाल दर्रे के माध्यम से ही कश्मीर शेष भारत से सड़क मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है।

✱ मध्य वह महान हिमालय के बीच विशाल सीमांत दरार (Great Boundary Fault) स्थित है यह कश्मीर से असम तक विस्तृत है।

✱ इस श्रेणी के दक्षिण का ढाल मंद एवं उत्तर की ढाल तीव्र है। इसकी ढाल पर छोटे-छोटे मैदान मिलते हैं, जिन्हें कश्मीर में मर्ग (जैसे- गुलमर्ग, सोनमर्ग) एवं उत्तराखंड में बुग्याल एवं पयार तथा मध्यवर्ती भागों में द्वार (जैसे- हरिद्वार) एवं दून (जैसे- देहरादून) कहा जाता है।

✱ इसे उप हिमालय एवं बाह्य हिमालय भी कहा जाता है। यह पर्वत श्रृंखला हिमालय की दक्षिणतम श्रेणी है।

✱ यह श्रेणी पंजाब में पोटवार बेसिन से प्रारंभ होकर पूर्व में कोसी नदी तक फैली हुई है।

✱ हिमाचल प्रदेश व पंजाब में यह श्रेणी अधिक चौड़ा (50 किमी) है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में इसकी चौड़ाई मात्र 15 किमी है। इसकी औसत ऊंचाई 600 से 1500 मीटर के बीच है।

✱ इसका निर्माण वृहत हिमालय एवं लघु हिमालय से लाए गए मलबों से हुआ है। आज जहां शिवालिक है वहां अतीत में इंडोब्रह्म नामक एक नदी प्रवाहित होती थी।

✱ इसे गोरखपुर के समीप डूंडवा श्रेणी तथा पूर्व में चुरिया मुरिया श्रेणी कहा जाता है। शिवालिक को जम्मू में जम्मू पहाड़ियों तथा अरुणाचल प्रदेश में डाफला, मिरी, अबोर और मिशमी पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है। यह हिमालय पर्वत श्रृंखला का नवीनतम भाग है।

✱ यह वृहत हिमालय महान हिमालय के उत्तर में स्थित है।

✱ इसकी लंबाई लगभग 965 मीटर तथा चौड़ाई लगभग 40 किमी है।

✱ इसमें काराकोरम, लद्दाख, जास्कर एवं कैलाश पर्वत श्रेणियां शामिल हैं। काराकोरम श्रेणी को उच्च एशिया की रीढ़ (Backbone of high Asia) कहा जाता है।

✱ सिंधु नदी लद्दाख एवं जास्कर श्रेणी के बीच से बहती है। यह नदी लद्दाख श्रेणी को बुंजी नामक स्थान पर 5200 मीटर गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है।

✱ भारत की सर्वोच्च चोटी गॉडविन ऑस्टिन (K2) काराकोरम श्रेणी पर स्थित है। इसकी ऊंचाई लगभग 8611 मीटर है।

✱ सियाचिन (नुब्रा घाटी में); विचाफो एवं बाल्टेरो (शिगार घाटी में) इस क्षेत्र की कुछ प्रमुख हिमनदियां हैं।

✱ ट्रांस हिमालय का निर्माण जीवाश्म वाले समुद्री अवसादों से हुआ है एवं यहां वनस्पति का पूर्ण अभाव पाया जाता है।

✱ सिंधु, सतलज, ब्रह्मपुत्र आदि नदियां ट्रांस हिमालय से ही निकलती हैं।

✱ ये पर्वत श्रेणियां भारत-म्यांमार सीमा पर उत्तर से दक्षिण की ओर फैली हुई हैं। इसके अंतर्गत पूर्वी अरुणाचल प्रदेश की मिशमी एवं पटकोई, नागा पहाड़ियां, मणिपुर पहाड़ियां, कछार पहाड़ियां, मिजो पहाड़ियां, त्रिपुरा पहाड़ियां आदि शामिल हैं।

✱ डाफाबाम (4578 मी) मिशमी पहाड़ियों की सबसे ऊंची चोटी है। सारामती (3926 मी) नागा पहाड़ियों की सबसे ऊंची चोटी है। इन पहाड़ी श्रृंखलाओं का निर्माण भी हिमालय के निर्माण के दौरान ही हुआ है।

सिडनी बुरार्ड नामक भूगर्भशास्त्री ने महान हिमालय का वर्गीकरण नदी घाटियों के आधार पर किया है। इन्होंने हिमालय की पश्चिमी सीमा सिंध नदी तथा पूर्वी सीमा ब्रह्मपुत्र नदी द्वारा निर्धारित की है। इन्होंने हिमालय के चार वर्ग बताए हैं-

✱ यह सिंधु एवं सतलुज नदी के बीच 500 किमी की लंबाई तक फैला हुआ है। यह भाग कश्मीर एवं हिमाचल प्रदेश में स्थित है तथा सर्वाधिक चौड़ाई इसी भाग में मिलती है।

✱ लद्दाख, जास्कर, पीरपंजाल, रोहतांग एवं धौलाधार श्रेणी इसी भाग में पाई जाती हैं। यहां उत्तरी ढाल पर वनस्पति का अभाव है, जबकि दक्षिणी ढाल पर सघन वनस्पति पाई जाती है। शुष्क होने के कारण हिमरेखा अधिक ऊंचाई पर पाई जाती है। 

✱ पंजाब हिमालय को कश्मीर हिमालय एवं हिमाचल हिमालय में विभाजित किया जाता है। 

✱ श्रीनगर एवं लेह के बीच का सड़क मार्ग जोजिला दर्रे से होकर गुजरता है।

✱ इस पर्वत श्रृंखला का विस्तार सतलज तथा काली नदियों के मध्य 320 किलोमीटर की लंबाई में विस्तृत है। गंगा एवं यमुना हिमालय के इसी भाग से निकलती हैं।

✱ बद्रीनाथ, केदारनाथ, त्रिशूल, माना, गंगोत्री, नंदा देवी, कामेत आदि चोटियां इसी भाग में स्थित है। मसूरी श्रेणी एवं नाग टिब्बा श्रेणी इसी भाग में स्थित हैं।

✱ नंदा देवी इस भाग की सबसे ऊंची चोटी है। माना एवं नीति कॉल द्वारा यह भाग तिब्बत से जुड़ा हुआ है।

✱ पर्वत प्रदेश हिमालय का सबसे लंबा प्रादेशिक विभाग है। यह काली नदी से लेकर तीस्ता नदी तक लगभग 800 किमी की लंबाई में विस्तृत है। 

✱ विश्व की सर्वोच्च पर्वत श्रृंखलाएं माउंट एवरेस्ट, कंचनजंगा, धौलागिरी और मकालू आदि इसी श्रेणी में स्थित हैं।

✱ यह तीस्ता नदी से लेकर दिहांग नदी (ब्रह्मपुत्र) तक 720 किमी की लंबाई में फैला हुआ है। यह श्रेणी नेपाल हिमालय की अपेक्षा नीची है तथा सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश और भूटान देश में फैली है।

✱ यहां की प्रमुख चोटियां कांगड़ा, चुमलहारी, काबरस, जांग सांगला, पौहुनी और नामचा बरवा हैं। इस हिमालय में अनेक पहाड़ियां भी पाई जाती हैं जैसे नागा, कोहिमा, मणिपुर,  मिजो, खासी आदि।

✱ इस भाग की प्रमुख नदियां दिहांग, दिबांग, लोहित तथा ब्रह्मपुत्र हैं।

✱ 16 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैला प्रायद्वीपीय पठार भारत का ही नहीं बल्कि विश्व का प्राचीनतम पठार है। यह आर्कियन चट्टानों से निर्मित है एवं इसकी चट्टानें अत्यधिक रूपांतरित हो चुकी हैं। विवर्तनिक दृष्टि से शांत क्षेत्र होने के कारण यहां भूकंप की संभावना काफी कम है।

✱ इसकी आकृति अनियमित त्रिभुजाकार है। अरावली, कैमूर, राजमहल एवं शिलांग की पहाड़ियां इसकी उत्तरी सीमा बनाती हैं जबकि दक्षिण में यह कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। वर्तमान समय में यह माना जाता है कि मेघालय का पठार प्रायद्वीप पठार का ही उत्तर पूर्वी भाग है।

✱ यह पठार भारत का प्राचीनतम भूखंड है जिसकी समुद्र तल से औसत ऊंचाई 600 से 900 मीटर तक है। यह तीन ओर से पर्वतों से घिरा है। उत्तर से दक्षिण की लंबाई 1600 किमी तथा पूर्व से पश्चिम में इसकी चौड़ाई 1400 किमी है।

✱ भू-संचलन के कारण इस पठार पर कई दरार घाटियों का निर्माण हुआ है। नर्मदा एवं ताप्ती जैसी नदियां दरार घाटियों का अनुसरण करते हुए, प्रायद्वीपीय पठार की ढाल के विपरीत प्रवाहित होकर अरब सागर में गिरती हैं।

✱ उत्तरी भाग को मालवा का पठार और दक्षिणी भाग को दक्कन ट्रैप कहते हैं।पठार के उत्तर-पश्चिम भाग में दरारी उद्भेदन द्वारा लावा के प्रभाव से दक्कन ट्रैप का निर्माण हुआ।

✱ पश्चिम के अरब सागरीय खंड के अवतलन के कारण हिंद महासागर का जल भू-भाग पर आ गया जिसे अरब सागर कहते हैं।

✱ यह एक अवशिष्ट पर्वत है एवं विश्व का प्राचीनतम मोड़दर पर्वत है। यह दिल्ली से अहमदाबाद तक लगभग 800 किमी की लंबाई में फैला हुआ है। गुरु शिखर इसकी सर्वोच्च चोटी है, जिसकी ऊंचाई 1722 मीटर है। यह आबू पहाड़ी पर स्थित है।

✱ यह कठोर क्वार्ट्ज चट्टानों से निर्मित है। इनमें सीसा, तांबा, जस्ता, एस्बेस्टास, अभ्रक आदि खनिज पाए जाते हैं। बार, पिपलीघाट, देवारी एवं देसूरी इसके कुछ महत्वपूर्ण दर्रे हैं।

✱ इसके पश्चिम की ओर से माही एवं लूनी नदी तथा पूर्व की ओर से बनास नदी निकलती है।

✱ यह प्राचीन युग की परतदार चट्टानों से निर्मित है, जिसमें लाल बलुआ पत्थर बहुतायत से मिलते हैं। इसकी औसत ऊंचाई 700 से 1200 मीटर है।

✱ यह पर्वतमाला पश्चिम से पूर्व की ओर भारनेर, कैमूर एवं पारसनाथ की पहाड़ियों के रूप में गुजरात से लेकर बिहार तक विस्तृत है। विंध्याचल पर्वत उत्तर भारत को दक्षिण भारत से अलग करती है।

 इस पर्वत श्रेणी की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ (1350 मी) है जो महादेव पर्वत पर स्थित है। पंचमढ़ी (1117 मी) भी महादेव पर्वत पर ही स्थित है।

✱ मैकाल पहाड़ी का सर्वोच्च शिखर अमरकंटक (1036 मी) है, जहां से सोन एवं नर्मदा नदियां निकलती हैं।

✱ यह एक ब्लॉक पर्वत है जिसके उत्तर एवं दक्षिण में क्रमश: नर्मदा एवं ताप्ती की दरार घाटियां स्थित हैं।

✱ यह पर्वतमाला मुख्यतः ग्रेनाइट एवं बेसाल्ट चट्टानों से निर्मित हैं। भूगर्भवेत्ताओं के अनुसार, 'विंध्याचल पर्वत नर्मदा नदी की दरार घाटी का खड़ा ढाल मात्र है।'

✱ यह वास्तविक पर्वत श्रेणी नहीं है, बल्कि प्रायद्वीपीय पठार का अपरदित खड़ा कगार है। यह पर्वत ताप्ती नदी के मुहाने से लेकर कुमारी अंतरीप तक लगभग 1600 किमी की लंबाई में विस्तृत है।

✱ पश्चिमी घाट पर्वत के उत्तरी भाग में (16° उत्तरी अक्षांश तक) लावा के निक्षेप पाए जाते हैं। इसके दक्षिणी भाग में नीलगिरी तक ग्रेनाइट एवं नीस चट्टानें मिलती हैं।

✱ पश्चिमी घाट पर्वत में चार महत्वपूर्ण दर्रे हैं-

(i) थाल घाट- औसत ऊंचाई 580 मीटर। नासिक एवं मुंबई के बीच का संपर्क मार्ग।

(ii) भोर घाट- औसत ऊंचाई 520 मीटर। मुंबई एवं पुणे के बीच का संपर्क मार्ग।

(iii) पाल घाट- औसत ऊंचाई 530 मीटर। कोयंबटूर एवं कोचीन के बीच का संपर्क मार्ग।

(iv) सिनकोट- औसत ऊंचाई 280 मीटर। त्रिवेंद्रम एवं मदुरई के बीच का संपर्क मार्ग।

✱ कलसुबाई (1646 मी) एवं महाबलेश्वर (1438 मी) उत्तरी सहयाद्री की महत्वपूर्ण चोटियां हैं। कुद्रेमुख (1892 मी) मध्य सहयाद्री की महत्वपूर्ण चोटी है।

✱ गोदावरी, भीमा, कृष्णा आदि नदियां उत्तरी सहयाद्री से निकलती हैं। तुंगभद्रा नदी एवं कावेरी नदी मध्य सहयाद्री से निकलती हैं।

✱ पूर्वी घाट पर्वत एवं पश्चिमी घाट पर्वत के मिलन स्थल पर नीलगिरी की पहाड़ी स्थित है। दोदाबेट्टा (2637 मी) नीलगिरी की सबसे ऊंची चोटी है। दोदाबेट्टा दक्षिण भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है। नीलगिरी के दक्षिण में अन्नामलाई की पहाड़ी है। यह पहाड़ी सागवान के वनों के लिए प्रसिद्ध है।

✱ दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी अनाईमुडी (2695 मी) अन्नामलाई की पहाड़ी पर स्थित है। अन्नामलाई के निकट ही पालनी की पहाड़ी है जिस पर कोडाईकनाल नामक पर्यटक स्थल स्थित है।

✱ नीलगिरी की पहाड़ी एक ब्लॉक पर्वत है। ऊटी नामक पर्यटक स्थल इसी पहाड़ी पर स्थित है। अन्नामलाई के दक्षिण में कार्डेमम (इलामल्लाई) की पहाड़ियां हैं। यह पहाड़ी इलायची की कृषि के लिए प्रसिद्ध है।

✱ दक्षिण भारत की पहाड़ियां रबड़, चाय एवं कहवा (कॉफी) की कृषि के लिए प्रसिद्ध है। पश्चिमी घाट पर्वत पर ही शरावती नदी का गरसोप्पा अथवा जोग जलप्रपात स्थित है। यह भारत का सबसे ऊंचा (255 मी) जलप्रपात है।

✱ कुल लंबाई-1300 किमी, औसत ऊंचाई 615 मीटर। यह पर्वत उत्तर में अधिक चौड़ा (190 किमी) एवं दक्षिण में कम चौड़ा (75 किमी) है। इसका उत्तरी भाग चार्नोकाइट एवं खण्डोलाइट चट्टानों से निर्मित है, जबकि मध्य भाग में क्वार्टजाइट एवं स्लेट जैसी चट्टानें पाई जाती हैं।

✱ इसकी सबसे ऊंची चोटी विशाखापत्तनम चोटी (1680 मी) है। महेंद्रगिरी (1501 मी) दूसरी सबसे ऊंची चोटी है, जो उड़ीसा में स्थित है।

✱ विभिन्न नदियों ने पूर्वी घाट पर्वत को कई स्थानों पर काट दिया है जिसके फलस्वरूप यहां कहीं अलग-अलग पहाड़ियां देखने को मिलती हैं जैसे- जावासी पहाड़ी (उत्तरी आर्कट जिला), जिंग्जी पहाड़ी (दक्षिणी आर्कट जिला), कोलाईमलाई (त्रिचनापल्ली जिला), शेवराय पहाड़ी (सलेम जिला) तथा बिलगिरी पहाड़ी (कोयंबटूर जिला) में विस्तृत हैं।

✱ शेवराय की पहाड़ी विभिन्न धात्विक खनिजों के लिए प्रसिद्ध है।

अनेक पर्वतों एवं नदियों की उपस्थिति के फलस्वरूप प्रायद्वीपीय पठार कई छोटे-छोटे पठार में विभक्त हो गया है इनका विवरण इस प्रकार है-

✱ व्यापार लगभग 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। क्रिटेशस से लेकर इयोसीन काल तक होने वाली ज्वालामुखी क्रियाओं के फलस्वरूप इस पठार का निर्माण हुआ है।

✱ यह पठार पूर्व में अमरकंटक व सरगुजा तक, पश्चिमी में कच्छ तक, दक्षिण में बेलगांव तथा दक्षिण पूर्व में राजमहेंद्री तक फैला है। ताप्ती नदी इसकी उत्तरी सीमा बनाती है। ये दोनों भाग आर्कियन नीस चट्टानों से निर्मित हैं।

 यह बेसाल्ट निर्मित पठार है जिसमें लावा की अधिकतम गहराई 2000 मीटर तक पाई गई है। पश्चिम से पूर्व की ओर जाने पर लावा की गहराई में कमी आती है। तेलंगाना का पठार एवं कर्नाटक का पठार दक्षिणी दक्कन के पठार के दो भाग हैं-

 गोदावरी नदी के द्वारा यह पठार दो भागों में विभाजित है। उत्तरी भाग पहाड़ी तथा वनाच्छादित है, जबकि दक्षिणी भाग पर उर्मिल मैदान पाए जाते हैं, जो तालाब के निर्माण के लिए आदर्श होते हैं। यहां पर वर्धा नदी बहती है।

 600 मीटर ऊंचाई की समोच्च रेखा इस पठार को दो भागों में बांटती है- (a) उत्तरी भाग- इस भाग पर कृष्णा व तुंगभद्रा नदियां प्रवाहित होती हैं। (b) दक्षिणी भाग- इसे मैसूर का पठार भी कहते हैं। दक्षिण भारत का उच्च व सुनिश्चित सीमा वाला पठार है। मैसूर पठार की प्रमुख नदी कावेरी है।

 बाबा बूदन की पहाड़ी (मालनाड पर) इसी पठार पर स्थित है। यह पहाड़ी लौह-अयस्क के लिए प्रसिद्ध है।

 यहां की चट्टानें छोटा नागपुर के पठार की चट्टानों से समानता रखती हैं। प्रारंभ में यह पठार मुख्य पठार से जुड़ा हुआ था। बंगाल की खाड़ी के निर्माण के दौरान यह मुख्य पठार से अलग हो गया।

 यह लावा एवं टर्शियरी चट्टानों से निर्मित है। जलोढ़ निक्षेप के कारण यह पठार मुख्य पठार से अलग हो गया।

 इसकी औसत ऊंचाई 700 मीटर है। यह पठार ग्रेनाइट एवं नीस चट्टानों से निर्मित है। इस पठार पर ऊपर उठे हुए समप्राय मैदान देखने को मिलते हैं। इस पठार पर दामोदर नदी एक भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है। यह पठार खनिज संसाधन एवं वन संसाधन की दृष्टि से काफी धनी है।

 लावा निर्मित मालवा का पठार काली मिट्टी का समप्राय मैदान है। इसकी ढाल गंगा घाटी की ओर है। इस पर बेतवा, नीवज, चंबल और माही नदियां प्रवाहित होती हैं। इस पठार पर उर्मिल मैदान मिलते हैं जिनमें कहीं-कहीं चपटी पहाड़ियां स्थित हैं। इस पठार की उत्तर-पूर्वी सीमा पर बुंदेलखंड व बहोखंड के पठार स्थित हैं।

 यह पठार प्राचीनतम बुंदेलखंड नीस से निर्मित है। इस पठार चंबल एवं यमुना नदियों द्वारा बड़े-बड़े खड्डों का निर्माण किया गया है। इस पर सोपानी वेदिकाएं पायी जाती हैं।

 यह पठार बलुआ पत्थर, चूना पत्थर एवं ग्रेनाइट से निर्मित है। इसके उत्तर में सोनपुर पहाड़ियां एवं दक्षिण में रामगढ़ की पहाड़ियां स्थित हैं।

 यह पठार अत्यंत ही उबड़-खाबड़ है। यहां जनसंख्या का घनत्व अत्यंत ही विरल है। इसका निर्माण मुख्यतः आर्कियन चट्टानों से हुआ है। इसकी औसत ऊंचाई 700 मीटर है।

 इसे सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान भी कहा जाता है। यह नवीनतम भौतिक प्रदेश है, जिसका निर्माण हिमालय की उत्पत्ति के पश्चात हुआ है। इस मैदान का क्षेत्रफल लगभग 7.5 लाख वर्ग किमी है। यह मैदान पंजाब से लेकर नागालैंड की सीमा तक लगभग 2400 किमी की लंबाई में फैला हुआ है। इसकी चौड़ाई 100 से लेकर 500 किमी के बीच है। पश्चिम में यह मैदान अधिक चौड़ा है एवं पूर्व की ओर कम चौड़ा है। इस मैदान की अधिकतम ऊंचाई सामान्यतः 250 मीटर से कम है। स्वेस के अनुसार पूर्व में इस मैदान की जगह एक विवर्तनिकी गर्त था, जिसका निर्माण हिमालय के निर्माण के दौरान हुआ था।

 नदियों द्वारा लाए गए निक्षेपों के फलस्वरूप गर्त के भर जाने से इस विशाल मैदान का निर्माण हुआ है। इस मैदान में निक्षेपित जलोढ़ की गहराई 2000 मीटर तक पाई गई है। हिमालय के निकट जलोढ़ की गहराई अधिक है, जबकि प्रायद्वीपीय पठार के समीपवर्ती भाग में गहराई कम होती जाती है। विशाल मैदान का आधा भाग उत्तर प्रदेश में तथा शेष आधा भाग पंजाब, हरियाणा, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम राज्यों में है।

 संरचनात्मक विशेषताओं व ढाल के आधार पर इस विशाल मैदान को चार भागों में बांटा जा सकता है-

 यह शिवालिक की तलहटी में सिंधु नदी एवं तीस्ता नदी के बीच अविच्छिन्न रूप से मिलता है। इसका निर्माण हिमालय से नीचे उतरती हुई नदियों द्वारा लाई गई बजरी (कंकड़ एवं पत्थर) के निक्षेपण के फलस्वरूप हुआ है।

 इसे शिवालिक का जलोढ़ पंख (Alluvial Fan) भी कहा जा सकता है। यह प्रदेश सर्वाधिक ऊंचा है (200-300 मीटर) परंतु इसकी चौड़ाई काफी कम (8-16 किमी) है। यहां कंकड़ों एवं पत्थरों की पारगम्यता काफी अधिक है, जिसके कारण नदियां लुप्त हो जाती हैं।

 इसका विस्तार भाबर प्रदेश से सटकर दक्षिण में है, जहां महीन कंकड़, पत्थर, रेत, चिकनी मिट्टी का निक्षेप मिलता है।

 तराई प्रदेश में भाबर प्रदेश की लुप्त नदियां पुनः सतह पर प्रकट हो जाती हैं। भाबर की तुलना में यह भाग अधिक समतल है, जिसके कारण नदियों का पानी इधर-उधर फैल कर दलदल का निर्माण करता है।

 इसकी चौड़ाई 15-30 किमी के बीच है। यह प्रदेश घने वनों से ढका हुआ है। वर्तमान समय में वनों को काटकर कृषि भूमि का विस्तार किया गया है। इस प्रदेश में मलेरिया का प्रकोप अधिक पाया जाता है।

 यह पुराने जलोढ़ से निर्मित मैदान है। इसका निर्माण मध्य से उत्तर प्लिस्टोसीन काल तक माना जाता है। इस भाग में बाढ़ का पानी सामान्यतः नहीं पहुंच पाता है।

 सतलज का मैदान, गंगा का ऊपरी मैदान एवं नदियों के मध्यवर्ती भागों पर बांगर प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। बांगर प्रदेश में कहीं-कहीं अपरदन के कारण ऊपरी मुलायम मिट्टी हट गई है एवं कंकड़ीली मिट्टी उभर आई है, जिसे भूड़ (Bhur) के नाम से जाना जाता है।

 बांगर मिट्टी के कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक सिंचाई के कारण कहीं-कहीं भूमि पर नमक की सफेद परत जम जाती है, जिसे रेह या कल्लर के नाम से जाना जाता है।

 यह नवीन जलोढ़ से निर्मित अपेक्षाकृत नीचा प्रदेश है। यहां नदियों के बाढ़ का पानी लगभग प्रतिवर्ष पहुंचता रहता है एवं नई मिट्टी का निक्षेप होता रहता है। इसका निर्माण उत्तर प्लिस्टोसीन काल में प्रारंभ हुआ एवं अभी भी इसका निर्माण कार्य जारी है।

 खादर प्रदेश का विस्तार डेल्टा प्रदेश के रूप में भी पाया जाता है। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा का पुराना भाग भारत में है, जबकि नया भाग मुख्य रूप से बांग्लादेश में है।

 उत्तर प्रदेश में नदी के साथ-साथ विस्तृत नवीन जलोढ़कों वाली बाढ़ के मैदानों की निम्न भूमि को खादर और पंजाब में बेट कहते हैं। विशाल मैदान में यत्र-तत्र गर्त हैं। पटना के निकट के गर्त को जल्ला तथा मोकामा के निकट के गर्त को टाल कहते हैं।

 इसका विस्तार पंजाब एवं हरियाणा के अलावा दिल्ली तक है। यह मैदान यमुना नदी एवं रावी नदी के बीच स्थित है। 

 इसका निर्माण सतलुज, व्यास एवं रावी नदियों द्वारा हुआ है। इसकी औसत ऊंचाई 250 मीटर है। यह मैदान मुख्यतः बांगर से निर्मित है। हालांकि नदियों के किनारे बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र की एक संकरी पट्टी पाई जाती है जिसे बेट कहा जाता है।

 दो नदियों के बीच की भूमि को दोआब कहा जाता है। जैसे- (i) बिस्ट दोआब- व्यास एवं सतलुज के बीच। (ii) बारी दोआब- व्यास एवं रावी के बीच। (iii) रचना दोआब- रावी एवं चेनाब के बीच। (iv) चाज दोआब- चेनाब एवं झेलम के बीच। (v) सिंध सागर दोआब- झेलम, चेनाब एवं सिंधु के बीच।

 इसका विस्तार अरावली के पश्चिम से लेकर भारत-पाकिस्तान सीमा तक है। इसका पूर्वी भाग अपेक्षाकृत अधिक आर्द्र है एवं यहां स्टेपी प्रकार की वनस्पतियां पाई जाती हैं।

 यहां की प्रमुख नदी लूनी है जो कच्छ की खाड़ी में गिरती है। बाल्टोरा तक इस नदी का जल मीठा है एवं उसके आगे खारा हो जाता है।

 सांभर, डीडवाना, डेगना आदि इस मैदान की प्रमुख नमकीन झीलें हैं। सांभर सबसे बड़ी नमकीन झील (300 वर्ग किमी) है।

✱ इस मैदान का विस्तार उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल राज्य में है।

✱ गंगा नदी के उत्तर में इस मैदान को दो भागों में विभाजित किया जाता है। पश्चिम का भाग रोहिलखंड का मैदान जबकि पूर्व का भाग अवध के मैदान के नाम से जाना जाता है।

✱ इस मैदान को तीन भागों में बांटा जाता है-

(i) ऊपरी गंगा का मैदान- पश्चिमी उत्तर प्रदेश।

(ii) मध्य गंगा का मैदान- पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं उत्तरी बिहार।

(iii) निम्न गंगा का मैदान- पश्चिम बंगाल।

✱ टाल भूमि एवं चौड़ भूमि मध्य गंगा के मैदान की विशेषता है। 

टाल भूमि- नीची भूमि जिसमें सालों भर जल भरा रहता है।

चौड़ भूमि- छपरा एवं खगड़िया के बीच, गंगा के समानांतर दलदली भूमि।

✱ निम्न भूमि, जो जल से भरी रहती है बील (Beel) के नाम से जानी जाती है। मध्यवर्ती गंगा के मैदान में गोखुर झीलों की बहुलता पाई जाती है।

✱ निम्न गंगा के मैदान की ऊंचाई 50 मीटर है, समुद्री ज्वार के कारण इसका एक बड़ा भाग दलदल बना रहता है।

✱ यह हिमालय पर्वत एवं मेघालय पठार के बीच स्थित एक लंबा एवं संकरा मैदान है।

✱ मिट्टी के जमाव के कारण कहीं-कहीं द्वीपों का निर्माण हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित माजुली द्वीप विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप है। नदी के कटाव मानवीय हस्तक्षेप के कारण वर्तमान समय में इस द्वीप का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।

भारत के तटवर्ती मैदान के निर्माण में समुद्र की क्रिया एवं नदियों के निक्षेप, दोनों का ही योगदान है। इस मैदान को पश्चिमी तटीय मैदान एवं पूर्वी तटीय मैदान में विभाजित किया जाता है- 

✱ इस मैदान का विस्तार सूरत से लेकर कन्याकुमारी तक है।

✱ इस मैदान को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है- (i) गुजरात का मैदान- गुजरात का तटवर्ती क्षेत्र। (ii) कोंकण तट- दमन से गोवा के बीच। (iii) कन्नड़ तट- गोवा से मंगलौर के बीच। (iv) मालाबार तट- मंगलौर एवं कन्याकुमारी के बीच।

✱ पश्चिमी तटीय मैदान की अधिकतम चौड़ाई गुजरात में है। नर्मदा एवं ताप्ती के मुहाने के निकट इसकी चौड़ाई अधिक (80 किमी) है।

✱ कन्नड़ तटीय मैदान सर्वाधिक संकरा है। मालाबार तट पर लैगूनों की अधिकता है।

✱ इस मैदान की नदियां छोटी एवं तीव्रगामी हैं। मलबों की कमी के कारण इस मैदान का विस्तार काफी कम हुआ है।

✱ पश्चिमी तटीय मैदान की नदियां ज्वारनदमुख का निर्माण करती हैं।

✱ महाद्वीपीय मग्नतट की चौड़ाई पूर्वी तट की अपेक्षा यहां पर अधिक है। विशेष रूप से यह काठियावाड़, गुजरात व कोंकण तट के समीप अधिक चौड़े हैं। गोवा से केरल तक इनकी चौड़ाई कम हो गई है।

✱ पश्चिमी तटीय मैदान में नारियल, चावल, सुपारी, केला और गर्म मसालों की कृषि की जाती है।

✱ यह मैदान स्वर्णरेखा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। यह पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में अधिक चौड़ा है।

✱ डेल्टा निर्माण के कारण दक्षिण भाग में इस मैदान की चौड़ाई अधिक पायी जाती है।

✱ मैदान के समुद्र के निकटवर्ती भाग में बालू के ढेरों की लंबी श्रृंखला मिलती है, जिनका निर्माण समुद्री लहरों द्वारा हुआ है। इन बालू के ढेरों के कारण ही चिल्का एवं पुलिकट जैसी झीलों का निर्माण हुआ है।

✱ पूर्वी तटीय मैदान का विस्तार अधिक होने एवं कृषि की दृष्टि से अधिक उपयुक्त होने के कारण पश्चिमी तट की तुलना में यहां अधिक जनसंख्या मिलती है।

✱ इस मैदान को उत्तर से दक्षिण उत्कल, उत्तरी सरकार व कोरोमंडल तट में विभाजित किया जाता है।

✱ तमिलनाडु के मैदान को दक्षिण भारत का अन्न भंडार कहा जाता है।

दोनों ही तटों पर निमज्जन एवं उत्थापन के प्रमाण देखने को मिलते हैं। पश्चिमी तट में मुंबई के निकट निमज्जन व कच्छ के निकट उत्थापन के प्रमाण मिलते हैं। इसी प्रकार पूर्वी तट पर पांडिचेरी के निकट निमज्जन के प्रमाण मिलते हैं।

✱ पूर्वी तट की अपेक्षा पश्चिमी तट अधिक कटा-छंटा है। फलस्वरूप यहां प्राकृतिक पोताश्रय पूर्वी तट की तुलना में अधिक हैं। पूर्वी तट का महाद्वीपीय मग्नतट पश्चिमी तट के महाद्वीपीय मग्नतट की तुलना में संकरा है।

✱ विशाखापत्तनम बंदरगाह डॉल्फिन नामक चट्टान के पीछे सुरक्षित है।

✱ पुलिकट एक वलयाकार प्रवाल झील (Atoll Lagoon) है जो श्रीहरिकोटा द्वीप द्वारा समुद्र से विलग है।

भारत के पास 615 द्वीप हैं, जिनमें से 572 बंगाल की खाड़ी में तथा 43 अरब सागर में स्थित है। अंडमान-निकोबार के 572 द्वीपों में से केवल 36 द्वीपों पर लोग रहते हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की उत्पत्ति टेक्टोनिक (Tectonic) है, जो लावे के बने हुए हैं। बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में स्थित द्वीपों के अतिरिक्त बहुत से द्वीप तट रेखा के निकट स्थित हैं। गंगा के डेल्टा, खंभात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी तथा मन्नार की खाड़ी में बहुत से तटीय द्वीप हैं।

✱ बंगाल की खाड़ी के मुख्य दीपों में अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह है। अंडमान द्वीप समूह को निकोबार द्वीप समूह से 10° चैनल अलग करता है। पश्चिमी बंगाल के तट से अंडमान द्वीपों की दूरी लगभग 2000 किमी है। भारत का सुदूर दक्षिण स्थान इंदिरा प्वाइंट ग्रेट निकोबार के दक्षिणी बिंदु पर स्थित है। (वर्ष 2004 की सुनामी में यह समुद्र में डूब चुका है।)

✱ अंडमान निकोबार द्वीप समूह के अधिकतर भाग घने जंगल से ढके हुए हैं, तथा सागरों में बहुत सी प्रवाल भित्तियां (Coral Reefs) पाई जाती हैं। 242 प्रकार की चिड़ियां इन द्वीपों में पाई जाती हैं, इसलिए इन द्वीपों को चिड़ियों का स्वर्ग भी कहा जाता है। सभी द्वीप ज्वालामुखिओं से प्रभावित रहे हैं। भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी बैरन द्वीप पर स्थित है।

✱ बैखलैंड ज्वालामुखी के अतिरिक्त नारकोंडम भी एक सक्रिय ज्वालामुखी रहा है। यह द्वीप अंडमान द्वीप से लगभग 80 किमी पूर्व में स्थित है। निकोबार द्वीप समूह में 18 द्वीप हैं, जिनमें से 11 द्वीपों पर लोग रहते हैं। निकोबार द्वीप समूह में बहुत सी प्रवाल भित्तियां हैं।

✱ अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या में निरंतर कमी हो रही है। इन द्वीपों में रहने वाली अधिकतर जनसंख्या आस-पास के देशों से आकर बसी हुई हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की आदिवासी जनजातियों में जरवा, ओंगेज, निकोबारी तथा सेंटिनेलीज प्रमुख हैं।

✱ अरब सागर में स्थित भारत के 43 द्वीप हैं, जिनमें से केवल 10 द्वीपों पर लोगों की आबादी मौजूद है। 

✱ केरल राज्य के कालीकट (वर्तमान कोझीकोड) नगर से सबसे निकट द्वीप एवं लक्षद्वीप की निकटतम दूरी 109 किलोमीटर है। लक्षद्वीप की राजधानी कवारत्ती इसी नाम के एक द्वीप पर स्थित है। 

✱ 8° चैनल लक्षद्वीप समूह को मालदीव समूह से अलग करती है। मिनिकॉय द्वीप इनमें सबसे बड़ा द्वीप है जिस पर लाइट हाउस और जलवायु विभाग की प्रयोगशाला स्थापित है।

✱ गंगा नदी के डेल्टा के सामने बंगाल की खाड़ी में तथा खंभात की खाड़ी में एवं प्रायद्वीप के तटों के निकट बहुत से छोटे बड़े द्वीप हैं।

✱ पश्चिम की ओर अरब सागर में काठियावाड़ प्रायद्वीप के तट पर पिरम, भैसाला, दीव, वैदा, नोरा, पिरोथान, करुण भार, खड़िया बेट तथा अलियाबेट ताप्ती नदी के मुख के सामने स्थित द्वीप हैं।

✱ मुंबई के पास बुचर द्वीप, ऐलीफेंटा, करंज तथा क्रॉस द्वीप स्थित हैं।

✱ मंगलौर बंदरगाह (कर्नाटक) के तट के निकट भटकल, पीजनकॉक, सेंट-मेरी द्वीप, मन्नार की खाड़ी में क्रोकोडाइन द्वीप, अडंडा दीप, पुलिकट के पास श्रीहरिकोटा, चिल्का झील के पास परिकुंड द्वीप, महानदी-ब्राह्मणी नदियों के डेल्टा के सामने शॉर्ट द्वीप, व्हीलर द्वीप तथा सुंदरवन डेल्टा के सामने गंगा-सागर एवं सागर द्वीप उल्लेखनीय हैं।

My App:- DOWNLOAD















टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भारत का भूगोल सामान्य परिचय (Geography of India General Introduction)

भारत की स्थिति एवं विस्तार- भारत की विशालता के कारण इसे उपमहाद्वीप की संज्ञा दी गई है। यह एशिया महाद्वीप के दक्षिण में स्थित है। इसका प्राचीन नाम 'आर्यावर्त ' उत्तर भारत में बसने वाले आर्यों के नाम पर किया गया। इन आर्यों के शक्तिशाली राजा भरत के नाम पर यह भारतवर्ष कहलाया। वैदिक आर्यों का निवास स्थान सिंधु घाटी में था, जिसे ईरानियों ने ' हिन्दू नदी' तथा इस देेेश को 'हिन्दुस्तान' कहा। यूनानियों ने सिंधु को 'इंडस' तथा इस देेेश को 'इंडिया' कहा। भारत का भूगोल 1. भारत विषुवत रेखा के उत्तरी गोलार्ध में अवस्थित है। भारतीय मुख्य भूमि दक्षिण में कन्याकुमारी (तमिलनाडु)  (8°4' उत्तरी अक्षांश) से उत्तर में इन्दिरा कॉल (लद्दाख) (37°6' उत्तरी अक्षांश) तक तथा पश्चिम में द्वारका (गुजरात) (68°7' पूर्वी देशांतर) से कीबिथू ( अरुणाचल प्रदेश) (97°25' पूर्वी देशांतर) के मध्य अवस्थित है। 2.   82°30' पूर्वी देशांतर भारत के लगभग मध्य (प्रयागराज के नैनी  सेे) से होकर गुजरती है जो कि देश का मानक समय  है। यह ग्रीनविच समय से 5 घंटे 30 मिनट आग

पर्यावरण किसे कहते हैं?(what is environment in hindi)

पर्यावरण किसे कहते हैं?(what is environment)   पर्यावरण किसे कहते हैं? पर्यावरण फ्रेंच शब्द 'Environ'  से उत्पन्न हुआ है और environ का शाब्दिक अर्थ है घिरा हुआ अथवा आवृत्त । यह जैविक और अजैविक अवयव का ऐसा समिश्रण है, जो किसी भी जीव को अनेक रूपों से प्रभावित कर सकता है। अब प्रश्न यह उठता है कि कौन किसे आवृत किए हुए है। इसका उत्तर है समस्त जीवधारियों को अजैविक या भौतिक पदार्थ घेरे हुए हैं। अर्थात हम जीवधारियों के चारों ओर जो आवरण है उसे पर्यावरण कहते हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार- पर्यावरण किसी जीव के चारों तरफ घिरे भौतिक एवं जैविक दशाएं एवं उनके साथ अंतःक्रिया को सम्मिलित करता है। सामान्य रूप में पर्यावरण की प्रकृति से समता की जाती है, जिसके अंतर्गत ग्रहीय पृथ्वी के भौतिक घटकों (स्थल, वायु, जल, मृदा आदि) को सम्मिलित किया जाता है, जो जीवमंडल में विभिन्न जीवों को आधार प्रस्तुत करते हैं, उन्हें आश्रय देते हैं, उनके विकास तथा संवर्धन हेतु आवश्यक दशाएं प्रस्तुत करते हैं एवं उन्हें प्रभावित भी करते हैं। वास्तव में विभिन्न समूहों द्वारा पर्यावरण का अर्थ विभिन्न दृष्टिक

भारत की भूगर्भिक संरचना, (Geological structure of India)

भारत की भूगर्भिक संरचना, (Geological structure of India) भारत की भूगर्भिक संरचना परिचय (Introduction) - किसी देश की भूगर्भिक संरचना हमें कई बातों की समझ में सहायता करती है, जैसे- चट्टानों के प्रकार, उनके चरित्र तथा ढलान, मृदा की भौतिक एवं रासायनिक विशेषताएं, खनिजों की उपलब्धता तथा पृष्ठीय एवं भूमिगत जल संसाधनों की जानकारी, इत्यादि। भारत का भूगर्भिय इतिहास बहुत जटिल है। भूपटल की उत्पत्ति के साथ ही इसमें भारत की चट्टानों की उत्पत्ति आरंभ होती है। इसकी बहुत सी चट्टानों की रचना अध्यारोपण (superimposition) के फलस्वरूप हुई। भूगर्भिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप गोंडवानालैंड अर्थात् दक्षिणी महाद्वीप का भाग था। अल्पाइन-पर्वतोत्पत्ति (orogeny) के उपरांत तृतीयक काल (tertiary period) में हिमालय पर्वत का उत्थान आरंभ हुआ और प्लिस्टोसीन (pleistocene)  युग में उत्तरी भारत के मैदान की उत्पत्ति आरंभ हुई। भारत की भूगर्भिक रचना का संक्षिप्त वर्णन आगे प्रस्तुत किया गया है। 1.आर्कियन शैल-समूह (Archaean or Pre- Cambrian Formations)- आर्कियन महाकल्प (Archaean Era) को प्री-कैम्ब्रियन (Pre-cambrian) युग भी कहा

भारत का अपवाह तंत्र। (Drainage system of india in hindi)

अपवाह तंत्र किसे कहते हैं? या अपवाह तंत्र क्या है? अपवाह का अभिप्राय जल धाराओं तथा नदियों द्वारा जल के धरातलीय प्रवाह से है। अपवाह तंत्र या प्रवाह प्रणाली किसी नदी तथा उसकी सहायक धाराओं द्वारा निर्मित जल प्रवाह की विशेष व्यवस्था है यह एक तरह का जालतंत्र या नेटवर्क है जिसमें नदियां एक दूसरे से मिलकर जल के एक दिशीय प्रवाह का मार्ग बनाती हैं। किसी नदी में मिलने वाली सारी सहायक नदियां और उस नदी बेसिन के अन्य लक्षण मिलकर उस नदी का अपवाह तंत्र बनाते हैं।  भारत का अपवाह तंत्र एक नदी बेसिन आसपास की नदियों के बेसिन से जल विभाजक के द्वारा सीमांकित किया जाता है। नदी बेसिन को एक बेसिक जियोमॉर्फिक इकाई (Geomorphic Unit) के रूप में भी माना जाता है जिससे किसी क्षेत्र एवं प्रदेश की विकास योजना बनाने में सहायता मिलती है। नदी बेसिन के वैज्ञानिक अध्ययन का महत्व निम्न कारणों से होता है- (i) नदी बेसिन को एक अनुक्रमिक अथवा पदानुक्रम में रखा जा सकता है। (ii) नदी बेसिन एक क्षेत्रीय इकाई (Area Unit) है जिसका मात्रात्मक अध्ययन किया जा सकता है और आंकड़ों के आधार पर प्रभावशाली योजनाएं तैयार की जा सकती हैं। (i