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भारत में अपवाह प्रतिरूप,(Drainage Pattern in India)

भारत में अपवाह प्रतिरूप,(Drainage Pattern in India)


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अपवाह प्रतिरूप

अपवाह प्रतिरूप किसे कहते हैं?

किसी नदी के रेखीय स्वरूप को अपवाह रेखा कहते हैं। कई रेखाओं के योग को अपवाह रेखा जाल कहते हैं। किसी नदी बेसिन में अपवाह रेखा जाल के दृश्य स्वरूप को अपवाह प्रतिरूप कहते हैं। जैसे- वृक्षाकर अपवाह प्रतिरूप, विभिन्न अपवाह बेसिन, जो एक सागर में गिरती हैं, एक अपवाह तंत्र कहलाती हैं, जैसे- भारत में बंगाल की खाड़ी अपवाह तंत्र तथा अरब सागरीय अपवाह तंत्र। जल अपवाह प्रतिरूपों पर चट्टानों की ठोरता, उनके प्रतिरोध (Resistance), चट्टानों की संरचना, अपक्षय एवं अपरदन (Weathering and Erosion), जलवायु, जल चक्र, भूगर्भीय इतिहास इत्यादि का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है।

भारत में भौगोलिक उच्चावचीय विषमताओं के कारण भारत के अपवाह तंत्र में निम्न अपवाह प्रतिरूप पाए जाते हैं: यथा-

1. पूर्ववर्ती अपवाह प्रतिरूप (Antecedent or Inconsequent Drainage Pattern)- 

इस प्रतिरूप को पूर्वानुवर्ती अपवाह प्रतिरूप भी कहते हैं। ऐसी नदियां जो हिमालय के उत्थान से पहले उसी स्थान पर बहती थी और हिमालय के उत्थान के कारण उन नदियों ने गहरे खड्डे एवं गार्ज काटकर अपनी दिशा दक्षिण की ओर मोड़ दी हो पूर्ववर्ती नदियां कहलाती हैं। सिंधु, सतलज, गंगा, काली (सरजू), अरुण (कोसी की एक सहायक नदी), तीस्ता एवं ब्रह्मपुत्र पूर्ववर्ती नदियों के उदाहरण हैं। इन सभी नदियों का उद्गम दीर्घ हिमालय के पार से है, अर्थात् ये नदियां तिब्बत के पठार अथवा जास्कर पर्वत से निकलती हैं, जो दीर्घ हिमालय पार स्थित है। इस अपवाह प्रतिरूप की नदियों द्वारा सरिता अपहरण का भी उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है।

2. अनुवर्ती अपवाह प्रतिरूप (Consequent Drainage Pattern)- 

जो नदियां किसी क्षेत्र के सामान्यतः ढलान के अनुसार बहती हैं अनुवर्ती नदियां कहलाती हैं। दूसरे शब्दों में अनुवर्ती नदियां प्रादेशिक ढाल का अनुसरण करती हैं। उदाहरण के लिए भारतीय प्रायद्वीप का जल अपवाह करने वाली गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, पेरियार, तथा शरावती नदियां जो प्रायद्वीप के सामान्य ढलान के अनुसार बहती हुई अपना जल बंगाल की खाड़ी में गिराती हैं अनुवर्ती नदियां कहलाती हैं।

3. परवर्ती अपवाह प्रतिरूप (Subsequent Drainage Pattern)-

अनुवर्ती सरिताओं के बाद उत्पन्न तथा अपनतियों या कटकों (Ridges) के अक्षों का अनुसरण करने वाली नदियों को इस प्रतिरूप में रखा जाता है। दूसरे शब्दों में किसी प्रमुख नदी की मुख्य सहायक नदियों को परवर्ती नदी कहते हैं। विंध्यन एवं सतपुड़ा पर्वतों से कुछ नदियां निकलकर उत्तर की ओर बहती हुई अपना जल यमुना अथवा गंगा नदियों में गिराती हैं। चंबल, सिंधु, बेतवा, केन तथा सोन परवर्ती नदियों के उदाहरण हैं।

4. अध्यारोपित पश्चजात (असंगत) अथवा अतिप्रेरित अपवाह प्रतिरूप (Superimposed, Epigenetic (Discordant) or Super-induced Drainage Pattern)-

इस प्रतिरूप में नदियां अपनी ऊपरी संरचना में निर्मित घाटी का आरोपण निचली संरचना में करती हैं, चाहे वह किसी प्रकार की संरचना क्यों न हो। इस प्रकार के जल अपवाह की उत्पत्ति तब होती है जब कोई नदी धरातल अपरदित शैलों पर बहती है। दूसरे शब्दों में यह एक ऐसा अपवाह प्रतिरूप है जो असंगत चट्टानों पर विकसित होता है। दामोदर, सोन, स्वर्ण रेखा, चंबल, बनास, गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा तथा ताप्ती नदियां तथा रीवा के पठार पर बहने वाली नदियां अध्यारोपित अपवाह के कुछ उदाहरण हैं।

स्मरणीय है कि इन नदियों के क्षेत्र में वृहद हिमालय की उत्पत्ति के पश्चात क्रीटेशस तथा इयोसीन काल में ज्वालामुखी का दरारी उद्भेदन हुआ जिससे निकला लावा नदी घाटियों में भर गया। वर्षा का जल पुनः इस निश्चित बेसाल्ट को अपरदित कर नदी की पुरानी घाटी को प्राप्त कर लिया इसलिए इन्हें अध्यारोपित नदी (Superimposed River) कहा जाता है।

5. द्रुमाकृतिक अथवा वृक्षिय अपवाह प्रतिरूप (Dendritic Drainage Pattern)-

वृक्ष की शाखाओं एवं टहनियों की भांति फैले हुए अपवाह को वृक्षिय अथवा द्रुमाकृतिक अपवाह कहते हैं। डेंड्रेटिक (Dendretic) शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 1898 में I.C.रसेल  महोदय ने किया था। इस प्रकार का अपवाह ऐसे क्षेत्रों में विकसित होता है जहां की चट्टानों में एकरूपता पाई जाती हो तथा उनमें भ्रंश (Faults) अथवा वलन (Folds) न पाया जाता हो और साथ ही साथ धरातल का ढलान मंद हो। इस प्रतिरूप में क्षेत्र की एक प्रमुख जलधारा होती है उसकी शाखाएं सभी दिशाओं से आकर मुख्य जलधारा से मिल जाती हैं। जिस तरह वृक्ष की छोटी शाखाएं बड़ी शाखा से मिलती हैं इस प्रतिरूप का विकास प्रमुख रूप से सपाट तथा चौरस भागों पर होता है। जैसे- गंगा, गोदावरी एवं कृष्णा।


यह भी पढ़ें- भारत के अपवाह तंत्र या प्रणाली


6. जालीदार अथवा जालयुक्त अपवाह प्रतिरूप (Trellis Drainage Pattern)-

जालीदार अथवा जालयुक्त अपवाह वलनदार स्थलाकृति (Folded Topography) में विकसित होता है। समांतर वलनदार पर्वत श्रेणियों पर प्राय: इस प्रकार के अपवाह प्रतिरूप पाए जाते हैं। वलनदार पर्वतों की चट्टानों की संरचना एवं कठोरता का इस प्रकार के प्रतिरूप पर विशेष प्रभाव पड़ता है। जालयुक्त अपवाह में सहायक नदियां किसी उद्यान की भांति होती हैं अर्थात् सहायक तथा छोटी नदियां एक जाल जैसी प्रतीत होती हैं। छोटा नागपुर में स्थित सिंहभूमि तथा शिवालिक एवं लघु हिमालय में इस प्रकार के अपवाह देखे जा सकते हैं।

7. कंटकीय अपवाह प्रतिरूप (Barbed Drainage Pattern)-

जिन नदियों के मुख्य नदी के साथ संगम असंगत नजर आए, वे कंटकीय अपवाह कहलाते हैं। यदि कोई सहायक नदी मुख्य नदी की दिशा के विपरीत दिशा में बहकर संगम बनाती हो तो उससे कंटकीय अपवाह प्रतिरूप की उत्पत्ति होती है। नेपाल में कोसी नदी की सहायक अरुण नदी कंटकीय अपवाह प्रतिरूप का एक उत्तम उदाहरण है।

8. आयताकार अपवाह प्रतिरूप (Rectangular Drainage Pattern)-

इस प्रकार का अपवाह ऐसे क्षेत्रों में पाया जाता है जहां स्थलाकृति में भ्रंश (Faults) पाए जाते हों। इस प्रतिरूप का विकास प्राय: वहां होता है जहां पर चट्टानों के जोड़ तथा सन्धियां आयत के रूप में होती हैं। आयताकार अपवाह प्रतिरूप में सहायक नदियां मुख्य नदी में लगभग समकोण बनाती हुई मिलती है। इस प्रतिरूप में सहायक नदियों की लंबाई छोटी होती है और जलयुक्त अपवाह की भांति समानांतर भी नहीं होती। जैसे- कोसी, कृष्णा नदी के ऊपरी भाग एवं विंध्य पर्वत को अपवाहित करने वाली नदियां ऐसे प्रतिरूप बनाती हैं। पलामू जिले का प्रवाह प्रणाली भी इसी प्रकार का है।

9. आरीय अपवाह प्रतिरूप (Radial Drainage Pattern)-

इसे अपकेंद्रीय अपवाह प्रतिरूप (Centrifugal Drainage Pattern) भी कहते हैं। इस प्रतिरूप की उत्पत्ति किसी गुंबद आकार की भू-आकृति अथवा ज्वालामुखीय शंकु की ढलानों पर विकसित होती है। आरीय अपवाह में किसी ऊंचाई के केंद्रीय स्थान से नदियां चारों ओर बहती हैं, जो किसी बाइसिकल के अरों के अनुरूप होती हैं। अमरकंटक पर्वत से निकलने वाली नदियां आरीय अपवाह प्रतिरूप का प्रमुख उदाहरण हैं। अमरकंटक पर्वत से निकलकर नर्मदा नदी पश्चिम की ओर, सोन नदी उत्तर की ओर, महानदी पूर्व की ओर तथा वेनगंगा (गोदावरी की सहायक नदी) दक्षिण की ओर बहती है। गुजरात में गिरनार की पहाड़ी तथा असम में मिकिर पहाड़ी पर आरीय अपवाह प्रतिरूप विकसित हुआ है।

10. वलयाकार अपवाह प्रतिरूप (Annular Drainage Pattern)-

वलयाकार अपवाह प्रतिरूप, ऐसी गुम्बदी संरचनाओं में जिनमें शैलें या चट्टानें संकेंद्रित (Concentric) हों। इस प्रकार की भू- रचना में सहायक नदियां एक वक्र अथवा चापाकार मर्ग से गुजर कर मुख्य नदी में मिलती है। सामान्य तौर से इस प्रकार के अपवाह प्रतिरूप भारत में नहीं पाए जाते। उत्तराखंड के कुमायूं डिविजन एवं तमिलनाडु में इस प्रकार के कुछ उदाहरण मिलते हैं।

11. समानांतर अपवाह प्रतिरूप (Parallel Drainage Pattern)-

किसी क्षेत्र, तट अथवा प्रदेश की नदियां एक दूसरे के समानांतर बहती हों तथा प्रादेशिक ढाल का अनुसरण करती हैं तो ऐसे अपवाह को समानांतर प्रतिरूप कहते हैं। पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर में गिरने वाली नदियां इस प्रकार के अपवाह का उत्तम उदाहरण है। तीव्र ढलान एवं कम चौड़े मैदान के कारण यह नदियां डेल्टा ना बनाकर ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं। कोंकण एवं मालाबार तट पर बहने वाली महाराष्ट्र की सार्या, सावित्री, गोवा की मांडवी, चपोरा तथा जुवारी, कर्नाटक की गंगावती, शरावती तथा नेत्रवती और केरल की पोनानी, पेरियार तथा पेंबा लगभग एक-दूसरे के समानांतर बहती हुई अपना जल अरब सागर में गिराती हैं, जिनका प्रतिरूप समानांतर है।

12. अव्यवस्थित अपवाह प्रतिरूप (Deranged Drainage Pattern)-

अव्यवस्थित अपवाह प्रतिरूप ऐसे क्षेत्रों में विकसित होता है जहां से बर्फ पिघल कर धरातल पर छोटी नदियां बनने लगी हों। बर्फ की चादरों (Ice-Sheet) के पिघलने से यदा-कदा हिमोढ़ पाए जाते हैं, जिससे उस क्षेत्र का ढलान सुनिश्चित नहीं होता, परिणामस्वरूप ऐसे क्षेत्र में बहुत सी छोटी सरिताएं एवं जल धाराएं बनाती हैं और छोटी-मोटी झीलों में अपना जल गिराती हैं। निश्चित ढलान न होने के कारण जल अपवाह अव्यवस्थित प्रतीत होता है। उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग, नॉर्वे, स्वीडन तथा भारत के लद्दाख के हिमनदों में इस प्रकार के जल अपवाह देखे जा सकते हैं।

13. अन्त: स्थलीय अपवाह प्रतिरूप (Inland Drainage Pattern)-

राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में अरावली अपवाह पर्वतमाला से निकलकर विलीन हो जाने वाली नदियां अंत: स्थलीय अपवाह बनाती हैं।

14. क्रमहीन अपवाह प्रतिरूप (Insequent Drainage Pattern)-

जब कोई नदी अपनी प्रमुख शाखा से विपरीत दिशा से आकर मिलती है, तब क्रमहीन या अक्रमवर्ती अपवाह प्रतिरूप का विकास हो जाता है। ब्रह्मपुत्र में मिलने वाली सहायक नदियां- दिहांग, दिवांग तथा लोहित इसी प्रकार का अपवाह बनाती हैं।

15. खंडित अपवाह प्रतिरूप (Intermittant Drainage Pattern)-

उत्तर भारत के विशाल मैदान में पहुंचने के पूर्व भाबर क्षेत्र में विलीन हो जाने वाली नदियां खंडित या विलुप्त अपवाह का निर्माण करती हैं।

16. मालाकार अपवाह प्रतिरूप (Braided Drainage Pattern)-

देश की अधिकांश नदियां समुद्र में मिलने से पूर्व अनेक शाखाओं में विभाजित होकर डेल्टा बनाती हैं, जिससे गुम्फित या मालाकार अपवाह का निर्माण होता है। जैसे- गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की निचली घाटी में प्रवाहित नदियां।

17. हेरिंग अस्थि अपवाह प्रतिरूप (Herring Bone Drainage Pattern)-

यह अपवाह प्रतिरूप जो 'पसली प्रतिरूप' (Rib Pattern) के नाम से भी जाना जाता है, का विकास तेज ढाल वाली पर्वत श्रेणियों के मध्य विस्तृत (चौड़ी) घाटियों वाले भागों में होता है। उदाहरण- झेलम नदी के ऊपरी भाग में इस तरह के प्रतिरूप का विकास हुआ है। हिमालय में पश्चिम-पूर्व दिशा में फैली घाटियों में इस अपवाह प्रतिरूप का आविर्भाव हुआ है।

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